कामरेड को लाल रंग से बेहद लगाव है. सलाम से लेकर लगाम तक. उन्होंने अपनी गली तक का नाम महान क्रांतिकारी के नाम पर रखा है ताकि कोई ऐरा गैरा घुस न सके. लेनिन मार्का टोपी लगाकर कामरेड जब गली से निकलते हैं तो लाल चौक चौकन्ना हो जाता है उनकी सुरक्षा में. तब कामरेड का सीना मुहावरे के हिसाब से छप्पन इंच का हो जाता है. सही नाप लिया जाय तो दो चार इंच ज्यादा ही निकलेगा. उनकी बाडी लैंग्वेज ऐसी होती है जैसे विक्ट्री परेड की सलामी लेने जा रहे हों.
कामरेड का हर एक्शन नपा तुला होता है सूत दर सूत. फालतू बकवास से उन्हें सख्त नफरत है. हर वक्त ही ही ठी ठी करने वाले उन्हें देखते ही गमगीन हो जाते हैं भले उनके गुजरते ही एक दूसरे को देखकर सांकेतिक हंसी में खिलखिलाहट बिखेरें. उनके मन में यह भय व्याप्त रहता है कि कहीं कामरेड ने मुड़कर तो उन्हें नहीं देख लिया.
दरअसल कामरेड ट्यूशनिया सब्जेक्ट के टीचर हैं जिनका रुतबा गरीब सुदामाओं से अलग होता है.अमर कांत की डिप्टी कलेक्टरी के अफसर और गंभीर सिंह पालनी की कहानी मेंढक के भावी डाक्टर ऐसे ही गुरु गंभीर शिक्षकों के उत्पाद होते हैं. प्रेक्टिकल के अंकों की चाबी विद्यार्थियों में अतिरिक्त भय का संचार करती है. इसीलिए वे राणाप्रताप के चेतक की तरह उनके इशारे पर चौकडी भरते हैं,जो नहीं भरते वे आजीवन दुखी रहते हैं. यही प्रेरणा उन्हें ट्यूशन की आड में मास्साब की जेबें भरने को मजबूर करती है.
चूंकि कामरेड कभी थोड़े थोड़े वामपंथी थे तो उनका रथ जमीन से छह इंच ऊपर चलता है. खुद से थोड़ा-बहुत असहमत होने वालों को पलक झपकते संघी घोषित करने में उन्हें कोई लाज लिहाज आडे नहीं आता. जय श्रीराम उनकी चिढ़ है.
कामरेड को जन आंदोलनों से बेहद लगाव है आपदा में अवसर की तरह. जहां कहीं हड़ताल, धरने की थोडी भी सुगबुगाहट या सुरसुराहट महसूस होती है कामरेड अपना झंडा पतुक्की लेकर हाजिर.उनका यह काम निस्वार्थ नहीं होता. दरअसल हर धरने प्रदर्शन को प्रेस रिपोर्टर, पैम्पलेट, और पोस्टर की अनिवार्य जरूरत होती है और हर आदमी का बस का नहीं यह काम. कामरेड पूरी तैयारी के साथ इस काम को अपने धवलकेशी सिर पर ओढ़ लेते हैं. क्रांति कारी कविताएं और महान लेखकों के उद्धरण उनकी जुबान पर रहते हैं. कुछ उनके पोस्टरों की स्थाई शोभा बढाते हैं जो प्रदर्शनी में काम आते हैं. यह उनकी ऊपरी आमदनी के बजाय साडड बिजनेस है.मजदूर दिवस पर कामरेड की जुबान और मुट्ठियों में इंकलाब की आग होती है. उस दिन शहर के सारे कार्यक्रम उनकी सुविधा और समय से तय होते हैं.अगले दिन सुबह सुबह अखबार में नाम देखते ही कामरेड की बांछें खिल जाती हैं. सुबह बन जाती है. तुरंत पत्नी को एक कप कडक चाय का आर्डर दिया जाता है. खुशी ज्यादा हो तो ब्लैक काफी.मोहल्ले में काफी पीने वाले एकाकी हैं कामरेड. एकमात्र यही खासियत उन्हें औसत आदमी से ऊपर उठाती है. वैसे भी उनका मकान पुतिन जैसी सुरक्षा से लैस है.
कामरेड से गलतियाँ बहुत कम होती हैं. कभी जब उन पर संकट आता है तो पडौसियों के घरों में अंडर ग्राउंड हो जाते हैं. नानुकुर करने पर उनके खिलाफ प्रतिक्रियावादी होने का फतवा तैयार रहता है.लेकिन अबकी बार कामरेड एक महान आपदा में फंस गये. उन्होंने सडक पर वर्चस्व की जंग लडते दो बलशाली सांडों को भिडते देखा तो सहानुभूति से खुद को रोक नहीं पाए और पहुंच गए उनके बीच समझौता कराने. अपने बीच लाल झंडे को देखकर सांड भड़क गए और खुद का झगडा छोड़कर कामरेड पर पिल पडे. कामरेड की हड्डी पसलियों का चूरा हो गया. महीनों की सिकाई और सेवा टहल से चलने फिरने लायक हुए हैं. सांड को आजीवन लाल कपडा न दिखाने की सीख लेकर.
अब कामरेड आवारा पशुओं की संरक्षक पार्टी विशेष के प्रति असीम घृणा से लबालब हैं.