Thursday, October 9, 2025

सांडों के बीच कामरेड

सांडों के बीच कामरेड 




कामरेड को लाल रंग से बेहद लगाव है. सलाम से लेकर लगाम तक. उन्होंने अपनी गली तक का नाम महान क्रांतिकारी के नाम पर रखा है ताकि कोई ऐरा गैरा घुस न सके. लेनिन मार्का टोपी लगाकर कामरेड जब गली से निकलते हैं तो लाल चौक चौकन्ना हो जाता है उनकी सुरक्षा में. तब कामरेड का सीना मुहावरे के हिसाब से छप्पन इंच का हो जाता है. सही नाप लिया जाय तो दो चार इंच ज्यादा ही निकलेगा. उनकी बाडी लैंग्वेज ऐसी होती है जैसे विक्ट्री परेड की सलामी लेने जा रहे हों. 

कामरेड का हर एक्शन नपा तुला होता है सूत दर सूत. फालतू बकवास से उन्हें सख्त नफरत है. हर वक्त ही ही ठी ठी करने वाले उन्हें देखते ही गमगीन हो जाते हैं भले उनके गुजरते ही एक दूसरे को देखकर सांकेतिक हंसी में खिलखिलाहट बिखेरें. उनके मन में यह भय व्याप्त रहता है कि कहीं कामरेड ने मुड़कर तो उन्हें नहीं देख लिया. 

दरअसल कामरेड ट्यूशनिया सब्जेक्ट के टीचर हैं जिनका रुतबा गरीब सुदामाओं से अलग होता है.अमर कांत की डिप्टी कलेक्टरी के अफसर और गंभीर सिंह पालनी की कहानी मेंढक के भावी डाक्टर ऐसे ही गुरु गंभीर शिक्षकों के उत्पाद होते हैं. प्रेक्टिकल के अंकों की चाबी विद्यार्थियों में अतिरिक्त भय का संचार करती है. इसीलिए वे राणाप्रताप के चेतक की तरह उनके इशारे पर चौकडी भरते हैं,जो नहीं भरते वे आजीवन दुखी रहते हैं. यही प्रेरणा उन्हें ट्यूशन की आड में मास्साब की जेबें भरने को मजबूर करती है. 

चूंकि कामरेड कभी थोड़े थोड़े वामपंथी थे तो उनका रथ जमीन से छह इंच ऊपर चलता है. खुद से थोड़ा-बहुत असहमत होने वालों को पलक झपकते संघी घोषित करने में उन्हें कोई लाज लिहाज आडे नहीं आता. जय श्रीराम उनकी चिढ़ है. 

कामरेड को जन आंदोलनों से बेहद लगाव है आपदा में अवसर की तरह. जहां कहीं हड़ताल, धरने की थोडी भी सुगबुगाहट या सुरसुराहट महसूस होती है कामरेड अपना झंडा पतुक्की लेकर हाजिर.उनका यह काम निस्वार्थ नहीं होता. दरअसल हर धरने प्रदर्शन को प्रेस रिपोर्टर, पैम्पलेट, और पोस्टर की अनिवार्य जरूरत होती है और हर आदमी का बस का नहीं यह काम. कामरेड पूरी तैयारी के साथ इस काम को अपने धवलकेशी सिर पर ओढ़ लेते हैं. क्रांति कारी कविताएं और महान लेखकों के उद्धरण उनकी  जुबान पर रहते हैं. कुछ उनके पोस्टरों की स्थाई शोभा बढाते हैं जो प्रदर्शनी में काम आते हैं. यह उनकी ऊपरी आमदनी के बजाय साडड बिजनेस है.मजदूर दिवस पर कामरेड की जुबान और मुट्ठियों में इंकलाब की आग होती है. उस दिन शहर के सारे कार्यक्रम उनकी सुविधा और समय  से तय होते हैं.अगले दिन सुबह सुबह अखबार में नाम देखते ही कामरेड की बांछें खिल जाती हैं. सुबह बन जाती है. तुरंत पत्नी को एक कप कडक चाय का आर्डर दिया जाता है. खुशी ज्यादा हो तो ब्लैक काफी.मोहल्ले में काफी पीने वाले एकाकी हैं कामरेड. एकमात्र यही खासियत उन्हें औसत आदमी से ऊपर उठाती है. वैसे भी उनका मकान पुतिन जैसी सुरक्षा से लैस है. 

कामरेड से गलतियाँ बहुत कम होती हैं. कभी जब उन पर संकट आता है तो पडौसियों के घरों में अंडर ग्राउंड हो जाते हैं. नानुकुर करने पर उनके खिलाफ प्रतिक्रियावादी होने का फतवा तैयार रहता है.लेकिन अबकी बार कामरेड एक महान आपदा में फंस गये. उन्होंने सडक पर वर्चस्व की जंग लडते दो बलशाली सांडों को भिडते देखा तो सहानुभूति से खुद को रोक नहीं पाए और पहुंच गए उनके बीच समझौता कराने. अपने बीच लाल झंडे को देखकर सांड भड़क गए और खुद का झगडा छोड़कर कामरेड पर  पिल पडे. कामरेड की हड्डी पसलियों का चूरा हो गया. महीनों की सिकाई और सेवा टहल से चलने फिरने लायक हुए हैं. सांड को आजीवन लाल कपडा न दिखाने की सीख लेकर. 

अब कामरेड आवारा पशुओं की संरक्षक पार्टी विशेष के प्रति असीम घृणा से लबालब हैं. 

Sunday, June 8, 2025

व्यंग्य विमर्श


तथाकथित व्यंयकारों को सादर सप्रेम 
नख दंत विहीन सरकारी और असरकारी व्यंग्य

जब से सत्ता की चाल ,चरित्र और चेहरे मोहरे में बदलाव हुआ है व्यंग्य की जमीन बंजर हो गयी है ।पता नहीं कब किस बात पर व्यंग्यकार और कार्टूनिस्ट को नक्सली बताकर उसकी सरकारी हत्या कर दी जाये ।अच्छा हुआ परसाईजी टाँग तुड़वाने का मामूली प्रसाद लेकर समय से इस दुनिया से दफा हो गये अन्यथा ....जेल जाने से तथाकथित लेखक और बुद्धिजीवी वैसे भी नहीं डरता क्योंकि उसके बाद बाजार में उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है ,सत्ता के बदलने से तो  पदम्  सम्भावना भी ।अमूमन हास्य व्यंग्य साथ साथ चलते हैं इसलिए उनके बीच का फर्क नजरअंदाज किया जाता है ।कविसम्मेलन तो अब हास्य व्यंग्य के ही पर्याय हो गये हैं जबकि दोनों के बीच बड़ा फर्क है ।हास्य जहाँ अपने हर रूप में गुदगुदाता है वहाँ व्यंग्य नश्तर चलाता है ,कई बार ख़ंजर भी ।कई बार व्यंग्य जब कटु उपहास और कटाक्ष का रूप ले लेता है तो उसके परिणाम भयंकर होते हैं ।इसीलिए व्यंग्य को केवल नकारात्मक न होकर सकारात्मक और सुधारात्मक होना चाहिए । हल्के फुल्के हास्य को लोग हँसकर झेल जाते हैं जबकि व्यंग्य को दुर्योधन की तरह दिल पर ले लेते हैं और मौका मिलते ही बदले की फ़िराक में रहते हैं।कितना ही लोग ऊपरी मन से  निंदक को नियरे रखने की उदारता दिखाएं लेकिन आलोचक की तरह व्यंग्यकार भी अझेल है।उसे हर जगह गालियां ही मिलती हैं ।यही उसका दुर्भाग्य है ।
जिन महापुरुषों ने साहित्य को सत्ता का स्थायी विपक्ष बताया था उन्हीं को बाकी कलाएँ गोल मोल नजर आती थीं, जिनकी न कोई प्रतिबद्धता थी ,न जोखिम।हर समय राग दरबारी।नख दंत विहीन कला की तुलना शालिग्राम से होती थी जिसमें कोई काँटा ही नहीं होता ।एकदम आशुतोष।उनकी स्प्रिंगदार जीभ इतनी घुमावदार थी कि उसमें अनेकान्तवाद की अपार संभावनाएं थीं ।वे ब्रह्म की तरह सर्वकालिक, होने के साथ ही कालातीत कला के पुरोधा थे ।वे साक्षात विरुद्धों के सामंजस्य थे ।उनके इशारों पर कलाओं के भूगोल खगोल बदलते थे ।प्रकाशकों की बत्ती जलती बुझती थी ।
व्यंग्य तो वैसे भी क्षत्रिय विधा है जो दीन हीन हो ही नहीं सकती ।व्यापारियों ने इसे भी सरकार की चापलूसी में लगा दिया है ।पता ही नहीं चलता कि व्यंग्यकार जूते चाट रहा है या जूते मार रहा है ।सत्ता जब ऐसी कटु सत्यवाचक विधा को भी अपनी जरखरीद दासी बना ले तो फिर कहने को बचता ही क्या है ? एक वक्त था जब सत्ताधीश कार्टूनों के आप्तवाक्यों के पीछे जनमत के कूटार्थ बाँचते थे ।अब तो वे दम ही तोड़ चुके हैं ।
सरकारी ठप्पा लगते ही लेखक की हर रचना विज्ञापन और क्रांति विरोधी हो जाती है।तब क्या रचना के लिये जेल जाये बिना क्रांति सम्भव ही नहीं ?पुरस्कार वापसी गैंग इसीलिए अब प्रतिक्रान्तिकारी होने का लाभ नहीं उठा सकता ।यानी राष्ट्रवादी होने की सारी सम्भावनाएं हमेशा के लिये समाप्त।अब सरकार बदलने पर ही शहर की सम्भावना सम्भव है ।गाँव का जीवन यों भी कष्टकारी है ।अतीत में चिरगांव से  राज्यसभा जाना सम्भव था लेकिन अब वहाँ सिर्फ मनरेगा की मजदूरी मिल सकती है ।उसमें भी पत्ती तय है ।
जब से मीडिया में सम्पादक की जगह मालिक ने जबरिया छीन ली है तब से वह सरकारोन्मुख हो चुका है ।मालिक का शुभ लाभ सरकार से ही सधता है तो उसके विरुद्ध कौन मतिमन्द जाना चाहेगा? अब हर जगह सम्पादक नाम का एक रीढ़हीन जीव दिखावे के लिये रख लिया जाता है जो मालिक की इच्छा के अनुसार कठपुतली की तरह नाचता रहता है ।थोड़ी सी आजादी उसे मालिक दे देता है ताकि उसे जीवित होने का अहसास बचा रहे ।वह इतना आत्मानुशासित हो जाता है कि सत्ता विरोधी लोकतांत्रिक आलोचना और रचना को विमर्श से बाहर रखने में ही पूरी ताकत लगा देता है ।यही ऑटो दिमागी कंडीशनिंग बाकी व्यक्तित्वहीन पुतलियों की हो जाती है जो उसको सन्तुष्ट रखती हैं।कहीं से कोई संकट या आपत्ति आती है तो सबसे पहले इसी निरीह प्राणी की बलि चढ़ाई जाती है ।अपवादस्वरूप किसी के कुछ कील कांटे बचे हैं तो उन्हें सीबीआई और आईडी के छापों ने झाड़ दिया है और वह चुपचाप मुख्यधारा में घिस और घुस चुका है ।जिंदा रहने की शर्त ही जब सरकारी विज्ञापन हो तो विकल्प भी क्या हो सकता है ।यानी राजनीति की तरह विकल्पहीनता का संकट यहाँ भी है ।ऐसे में न असरकारी पत्रकारिता की गुंजाइश है ,न साहित्य की ।सब कुछ तात्कालिक  उत्पादन में बदल चुका है आदतन कि इसके सिवा कुछ कर नहीं सकते।
अब सबसे बड़ा संकट उन पत्रकारों ,रचनाकारों के सामने है जो अपने औज़ारों से क्रांतिकारी काम लेना चाहते हैं।उन्हें कोई मीडिया समूह झेलने को तैयार नहीं।पार्टियों की अपनी शर्तें हैं।सब कुछ ऐसे छद्म में तब्दील हो चुका है जहाँ कोई पहचान ही नहीं बची है ।कुल मिलाकर यह विचार और विचारधारा की निराशा का दौर है ।ईश्वर के साथ इतिहास की मौत काफी पहले हो चुकी है ।ऐसी उच्च नैतिकता में केवल शुध्द धंधा सम्भव है और कोई रास्ता नजर नहीं आता ।जो यह नहीं कर सकते वे मरने के लिये आजाद हैं।
प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के बाद की खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है ।मोबाइल के डिजिटल कैमरे के वीडियो ने प्रत्यक्ष साक्षी की भूमिका अदा की है ।उसके आधार पर कार्रवाई  हो रही है और निर्णय भी दिये जा रहे हैं।दुष्कर दुनिया अब इतनी नजदीक हो चुकी है कि वाकई वह मुट्ठी में है ।अफवाहों और फेकन्यूज ने मीडिया का एक नया ही रूप खोल दिया है।साइबर क्राइम ने पारम्पिक अपराध को पीछे छोड़ दिया है ।अब तकनीक में पिछड़ा हुआ ही सही मायने में पिछड़ा है ।
 साहित्य की दुनिया में साहित्यकारों की छवि का कोई ठिकाना नहीं ।उनके मूल्यांकन के लचीले अवसरवादी मूल्य कब बदल जाएंगे कोई ठिकाना नहीं ।एवरेस्ट पर बैठी महानता कब भूलुंठित हो जायेगी कह नहीं सकते।उसे गिराने उठाने में सम्पूर्ण पुरुषार्थ की इतिश्री हो रही है ।
साहित्य के राष्ट्रवादी उभार में आये बदलाव में यह देखा जा सकता है कि कैसे पुराने दौर में कीड़े मकोडों में शुमार लेखकों पर लक्ष्मी बरसने लगी है ।उनके अभिनंदन ,वंदन और चंदन की चर्चा चहुं ओर है ,जबकि पुराने प्रतिष्ठित महामानवों पर मक्खियाँ भी नहीं भिनक रहीं ।हां ,अचूक अवसरवादियों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।
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