Saturday, June 22, 2024

डबल बैड

डबल बैड और दो गज की दूरी

# मूलचंद्र गौतम

जिस व्यक्ति ने भी प्रथम बार डबल बैड की कल्पना और आविष्कार किया उसे निश्चित ही नोबेल मिलना चाहिये।इस डबल बैड ने भारत की मजबूत संयुक्त परिवार की लाज लिहाज की प्रथा की जड़ों में मट्ठा डाल दिया।यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रारंभ था।हालांकि जब परिवार नियोजन के कोई साधन उपलब्ध नहीं थे तब भी प्राकृतिक रूप से हर घर में एक कबड्डी और क्रिकेट की टीम तैयार हो जाती थी जो बाद में पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे को लेकर महाभारत रच देती थी ।डबल बैड कल्चर ने कम से कम पति पत्नी के बीच स्वेच्छा से यह समझ तो पैदा कर दी कि उन्हें अपने आप लगने लगा दो या तीन बच्चे, होते हैं  घर में अच्छे।अब चीन भी भारत के पदचिन्हों पर चलने लगा है।यह बात अलग है कि भारत में  ये नारा देने वाले तत्कालीन यूथपतियों  और दलपतियों के जबरिया नसबन्दी के काम ने सरकार के परखच्चे उडा दिये।

कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल पार्क का नजारा जिन्होंने नहीं देखा वे नहीं जान सकते कि डबल बैड के आयतन के बराबर की कुठरिया में भरे-पूरे परिवार के बीच पति पत्नी को गुटुर गूँ करने का भी मौका नहीं मिलता।इसलिए वे मौका पाते ही फुर्र हो जाते हैं और उन्हें तल्लीनता में घण्टों पता ही नहीं चलता कि आसपास क्या हो रहा है।

लेकिन बुरा हो इस कोरोना काल का जिसने बड़ों बड़ों के डबल बैड को सिंगल बना दिया है।हर सुगृहिणी पति को हर समय दो गज दूरी की हिदायत पुलिसिया अंदाज में देती रहती है।यहाँ तक कि बायोडाटा में सिंगल दिखाकर एक साथ चुनौती और चेतावनी देती रहती है जैसे फेरों के समय  सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा करने वाली कोई और थी।अब झण्डू बाम वाली हीरोइन उनकी माडल है।जैसे पति को निहायत निकम्मा और फालतू सिद्ध करने का इससे बड़ा सुनहरा कोई मौका जिन्दगी में कभी मिलता ही नहीं। 

इंटरनेट ने इस आपदा में सोने पर सुहागे का काम किया है।जब देखो श्रीमतीजी इंटरनेट पर सखी सहेलियों,मायके वालों से चैटिंग में लगी हैं।काल की कोई सीमा ही नहीं।चाय नाश्ते खाने का कोई समय ही नहीं।इंटरनेट ने उनके सामने एक ऐसी दुनिया खोल दी है जहाँ सब कुछ भी करने के लिये सर्व स्वतंत्र हैं,किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं ।जगत और उसके सारे सम्बंध मिथ्या हो गये हैं।हाथ मिलाना ,बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना गुनाह हो गया है।घर का हर सदस्य होम आइसोलेशन के मजे ले रहा है ,यूट्यूब देख देखकर फाईव स्टार कुक हो गया है।किसी के पास किसी के लिये कोई वक़्त नहीं।सब जैसे एक दूसरे को खा जाने वाली निगाहों से घूर रहे हैं मानो विश्व की इस महामारी का एकमात्र कारण वही हों ।व्यक्तिवादी अस्तित्व और अस्मिता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा जिसने सार्त्र,कामू और काफ्का के दर्शन को फेल कर दिया है।

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बहुरुपिया

बहुरूपिये वायरस की बेइज्जती

# मूलचंद्र गौतम 

कोरोना वायरस किसी बहुरूपिये मायावी राक्षस से कम नहीं है।जिन्होंने राम रावण युद्ध का वर्णन पढा है वे जानते हैं कि इसे पराजित और परास्त करना कितना कठिन काम है।यह रक्तबीज है,कालिया नाग है ,मारीच है जो आसानी से नष्ट होने को तैयार नहीं।महामारियों के इतिहास में कोरोना ने प्लेग को बहुत पीछे छोड़ दिया है।लोग अपनों को कन्धा देने तक को तैयार नहीं।अस्थि चयन और विसर्जन तो दूर की बात है।कलिकाल   में समस्त आसुरी शक्तियां इसी में  समाहित हो गयी हैं।पहले एक मामूली सा राक्षस तैंतीस करोड देवताओं पर भारी पडता था तो मानुषों की तो कोई गिनती ही नहीं।कोरोना को भी अपनी बेइज्जती कतई बर्दाश्त नहीं।बेइज्जती से यह सुरसा के मुँह की तरह विशालकाय होता चला जाता है।बाबा ने पहले ही आगाह कर दिया था -खल परिहरइ  स्वान की नाईं।

पूरी दुनिया के तमाम वैज्ञानिक,डाक्टर और विशेषज्ञ रातदिन इसकी काट  ढूंढने में लगे हुए हैं।तरह-तरह के टीके ईजाद किये जा रहे हैं।टोने टोटके अलग।ऊपर से नीम हकीमों के नुस्खे-काढे। हर तरह का धंधा चालू आहे ।इन  सब उपायों और उपचारों से इसका गुस्सा आसमान तक पहुँच गया है।कोरोना को कष्ट है कि जो गालियां देश के नेताओं के लिये फिक्स हैं वो उसे क्यों दी जा रही हैं?क्या इसलिये कि उसने विश्व की हर सत्ता और व्यवस्था की पोल खोल दी है?

इसीलिए माबदौलत ने तय किया है कि बाबा की रणनीति के तहत इसे तरह-तरह की निंदा से नहीं प्रशंसा से मारा जाना चाहिये।बाबा ने भी सर्वप्रथम खल वन्दना करके इसके कोप से आत्मरक्षा की थी।इसीलिए चतुर सुजानों ने इसकी प्रशंसा और अभिनंदन -वंदन के ढेर लगा दिये हैं ताकि वे इसके प्राणघातक कहर से सुरक्षित रह सकें।कोरोना चालीसा में  इस बहुरूपिये को ब्रह्म ही स्थापित कर दिया गया है।चमगादड के इस वंशज की महिमा अपरंपार है।इसके मेहमानों तक को उल्टा लटकना पडता है तो दमघोंटू शिकारों का क्या कहिये?

 आज भी मोहल्ले का शार्प शूटर सबसे पहले उनसे हिसाब चुकता करता है जो उसे नमस्ते नहीं करते।हर आते-जाते से उसका सवाल होता है कितने भाई हो ,जबाब मिलते ही उनकी संख्या में एक बढाकर पूछता है ,इतने होते तो मेरा क्या कर लेते और उसकी ढिशूम ढिशूम चालू हो जाती है।बयरु अकारण सब काहू सौं।ऐसा नहीं कि यह गुण्डा आदर करने वालों पर कोई रहम दिखाता है बल्कि उनको बेगारी में पकड लेता है और जिन्दगी भर उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी से गुलामी कराता है।गिद्ध सबसे पहले अपने शिकार की आँखें नौंचता है ताकि उसे कुछ दिखाई न दे।यह बाली की तरह सबसे पहले जीव के फेफड़ों को जकड़ता है ताकि मरीज इसके सामने  बेदम हो जाय ।क्या कल्कि अवतार का यही सही समय है?

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पाजिटिव

कृपया हमेशा पॉजिटिव होने से बचें 

# मूलचंद्र गौतम 

प्यारेलाल उम्र से पूरे पक चुके हैं लेकिन  आज तक समझ नहीं आया कि कब उन्हें पॉजिटिव होना चाहिए और कब निगेटिव।उन्हें तो  देव दानव ,जीवन और मृत्यु ,सत असत के द्वंद्व का ही पता है जो शाश्वत और सनातन है।सकारात्मकता और नकारात्मकता में वह बात नहीं। मोटी अकल और रटंत विद्या वालों की यही दिक्कत है कि अगर वे कहीं चौराहे पर फँस जायें तो उनकी  बाँये और दाँये की समझ ही गायब हो जाती है क्योंकि वे उल्टा और सीधा ही समझ पाते हैं या लेफ्ट और राइट ।वो तो भला हो ध्रुवतारे का जो हमेशा उत्तर में रहता है अन्यथा ज्यादातर लोग पूर्व और पश्चिम भी नहीं पहचान पाते जैसे कुछ भले आदमी ध्रुवतारे को ही नहीं चीन्ह सकते।उनके लिये मामूली सी दूरी भी बिल्लात यानी विलायत है।

प्यारेलाल को बचपन से सीधे रास्तों पर चलने की आदत है इसलिए वे कभी वृंदावन नहीं गये क्योंकि उन्हें कुंज गलियों में फँसने का डर है।उन्हें तो वसंत कुंज में अपने भाईसाब का घर ढूँढने में ही घण्टों लग जाते हैं क्योंकि वहाँ कोई भला आदमी पडौसी का नाम और नम्बर तक नहीं जानता।इन तमाम हालात के लिये कोई और नहीं वे खुद जिम्मेदार हैं।दरअसल उन्हें बचपन से ही जीवन के जो सूत्र और सुभाषित घुट्टी में पिलाये गये हैं युधिष्ठिर की तरह वे उनके दिमाग से निकलते ही नहीं।मसलन शिव संकल्प सूक्त सहित कृपया बाँये चलें,धीरे चलें, घर पर कोई आपका इन्तज़ार कर रहा है,सत्यं वद धर्मं चर,परहित सरिस धर्म नहिं भाई।वे शमशान में विवाह के गीत तो नहीं गा सकते।अब कोई कुछ भी कहे वे अपने मार्ग से डिगते नहीं।कोई कृष्ण ही उनका दुरुपयोग कर सकता है।

प्यारेलाल एकला चलो में परम विश्वास रखते हैं।साँयकालीन भ्रमण में जब सारे रिटायर्ड बुजुर्ग पेंशन,फंड,डीए ,बेटे बहुओं ,पडौसियों के सामूहिक निंदा रस में  तल्लीन रहते हैं तब वे अपने आध्यात्मिक आनंद में पेड़,पौधों,फूलों और चिडियों को एकटक निहारते रहते हैं।यह वैराग्यपूर्ण गैर दुनियादारी उन्हें घर में भी अजनबी बनाये रहती है।यों खुद को व्यस्त रखने के लिये उन्होंने पाजिटिव थिंकर्स फोरम और लाफ्टर क्लब की सदस्यता ले रखी है जहाँ वे निरंतर सादा जीवन उच्च विचारों का प्रचार करने में लगे रहते हैं लेकिन नकली ठहाके झेलना उनके बस का नहीं ।उन्हें संसार में विपक्ष तक निगेटिव नजर नहीं आता।विज्ञान और दर्शन के सामंजस्य से उन्होंने जो जीवन दर्शन गढा है उसमें बिजली की तरह पाजिटिव और निगेटिव सृष्टि के विकास के दो अनिवार्य तत्व हैं।

लेकिन जबसे प्यारेलाल को डाक्टरों ने कोरोना पाजिटिव घोषित किया है उनका यह विश्वास धराशायी हो गया है।जैसे पूरी दुनिया में उल्टी गंगा बहने लगी है।वे बाबा के सुर में गाने लगे हैं -अब लौं नसानी अब न नसैहों।जैसे यही उनकी आईसीयू, आक्सीजन और रेमीडिसिवर  है।अब उनका जिंदगी का  फलसफा बदल गया है।अब सन्दर्भ और प्रसंग के बिना वे कोई बात नहीं करते।अब तक वे थरूर की अंग्रेजी से ही परेशान थे लेकिन कोरोना और मनोविज्ञान की अजीबोगरीब भाषा के जंजाल ने उनका जीना हराम कर दिया है।डिक्शनरी भी फेल है ।वे समझ गये हैं कि जिंदगी में और मेडिकल की तरह अलग-अलग अनुशासनों की भाषा में जमीन आसमान का फर्क है।इस कलिकाल में खग जाने खग ही की भाषा और ठग जाने ठग ही की भाषा।अवसाद से बचने का यही एकमात्र मध्यमार्ग है।परधर्म में टाँग अडाने या उसमें खाहमखाह घुसाने से उसके टूटने का खतरा है।अंत में उनका निष्कर्ष कि हमेशा पाजिटिव होने से बचो ,जिन्दा रहने के लिये कभी कभार निगेटिव होना भी जरूरी है।यों भी इतिहास गवाह है कि निगेटिव ऊर्जा सदैव से पाजिटिव से ज्यादा ताकतवर होती आई है।जरा सी चींटी पहाड जैसे हाथी को हिला देती है और जरा सा नीबू क्विंटलों दूध को सेकेंड्स में फाड़ देता है।

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सोना उछ्ला

सोना उछ्ला चांदी फिसली 

# मूलचंद्र गौतम 

आज भी आम आदमी की समझ में सेंसेक्स और निफ्टी के बजाय प्याज ,टमाटर की तरह सोने-चांदी की कीमतों से ही मंहगाई का माहौल पकड में आता है।उसके लिये डालर और पौंड से रुपये की कीमत के बजाय सोने-चांदी का भाव ज्यादा प्रामाणिक है।सरकार भी जनता के मन में अपनी साख जमाने के लिये लगातार बताती रहती है कि उसके पास विदेशी मुद्रा के अलावा कितना सोना जमा है।


पुराने जमाने के आदमियों के पास सोने का भाव ही भूत और वर्तमान को नापने का पैमाना होता है।घी,दूध,गेहूँ,चना,गाय ,बैल और भैंस का नम्बर इनके बाद आता है।आजकल चाय का रेट भी इस दौड में शामिल हो गया है।कारण सबको मालूम है।

सोने पर अमीरों का एकाधिकार है बर्तन भले उन्हें चांदी के पसंद आते हों।उनके मंदिरों में भगवान भी अष्टधातु के बजाय  शुद्ध सोने के होते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें किसी सीबीआई और ईडी के छापों का डर नहीं होता।गरीबों का सपना भी हकीकत में न सही लोकगीतों में सोने के लोटे में गंगाजल पानी का होता था और मेहमानों के लिये भोजन भी सोने की थाली में परोसा जाता था।अब तो स्टील के बर्तनों ने गरीब पीतल और ताँबे के बर्तनों को प्रतियोगिता से आउट कर दिया है और दावतें भी पत्तलों के बजाय प्लास्टिक के बर्तनों पर होने लगी हैं ।

खरे सोने के नाम पर रेडीमेड जेवरों में मिलावट का पता ही नहीं चलता।जबसे सरकार ने हालमार्क छाप जेवरों की बिक्री अनिवार्य की है तब से मिलावटखोरों की नींद हराम है।ज्यादा अमीरों ने सफेद सोने के नाम पर प्लेटिनम खरीदना शुरु कर दिया है लेकिन पीले सोने को मार्केट में पीट नहीं पाये हैं।दो नम्बर का पैसा आज भी सोने में ज्यादा सुरक्षित रहता है भले बैंक के लाकरों में बंद पडा रहता हो ।

जबसे सोने के जेवरों की छीन झपट शुरु हुई है तबसे नकली गहनों ने जोर पकड लिया है।अब झपट मार भी पछताते हैं कि क्या उनकी मति मारी गयी थी जो इस धंधे में आये।इसलिये उन्होंने हथियारों की तस्करी शुरू कर दी है।

नोटबंदी के बाद रियलिटी मार्केट डाऊन है जबकि सोने में निरंतर उछाल है।वो तो सटोरियों के चक्कर में शुगर और ब्लड प्रेशर की तरह सोना थोडा ऊपर नीचे होता रहता है लेकिन आयात में आज भी वह नम्बर वन है।एयर पोर्टों पर ड्रग्स के मुकाबले सोने की तस्करी की खबरें ज्यादा आती हैं।तस्कर भाई बहिन पता नहीं शरीर के किन किन गुप्तांगों में सोना छिपाकर ले आते हैं।सोना आखिर सोना है।


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मैया मैं तो मोबाइल

मैया मैं तो मोबाइल ही लैहों 


# मूलचंद्र गौतम 

सूरदास आज होते तो उन्हें कृष्ण की बाललीला में अनेक संशोधन करने पडते।उनके आराध्य को परम प्रिय माखन और मलाई दो नंबरी मोटी घूस के पर्याय हो चुके हैं।सीबीआई मैया अब कृष्ण को थर्ड डिग्री देकर आत्मस्वीकृति करवाकर  उगलवा लेगी कि  मैने ही माखन खायो।ग्वाल बाल साफ बच जायेंगे।

इसी तरह अव्वल तो बालकृष्ण मैया से चन्द्र खिलौना की जगह मोबाइल की डिमांड करते क्योंकि उन्हें मालूम होता कि चौदहवीं का चांद दूर से जितना खूबसूरत दिखता है पास से उतना ही बदसूरत है।दूसरे मैया को भी अब चंदा भैया उतने प्यारे नहीं लगते जितने पहले थे।पिता की सम्पत्ति में बराबर की हिस्सेदारी ने भाई बहिन के फिल्मी प्यार में गाँठ डाल दी है,तो लाल कृष्ण के मन में भी खुद थाली भरकर पुए खाने वाले चन्दामामा का भेदभाव प्याली में साफ दिखता है।इसने राखी के पवित्र निस्वार्थ रिश्ते में आजीवन मुकदमेबाजी का रास्ता खोल दिया है।इससे रक्षाबंधन और भाई दूज जैसे त्यौहार सिर्फ दिखावे के लिये इसलिए चल रहे हैं क्योंकि इन दो दिनों में सरकार बहनों को अपनी बसों में यात्रा की मुफ्त सुविधा देती है इस बहाने बहनों को भी भाईयों से भात, छोछ्क की गारंटी बनी रहती है।इस टोटके से हर सरकार को बहनों का वोट और समर्थन भी मुफ्त में मिल जाता है।

आधुनिक युग में चंद्रमा और मोबाइल के तुलनात्मक विश्लेषण में मोबाइल का पलडा भारी पडता है।यों भी अब जब चाँद पर बस्ती बसाने की बात हो रही है तो बिना सेटेलाइट फोन के तो बात हो नहीं पायेगी।सुभद्रा के जमाने में मोबाइल होता तो चक्रव्यूह में फँसकर अभिमन्यु की हत्या न होती।सुभद्रा चक्रव्यूह भेदन के बारे में अर्जुन उवाच को रिकार्ड कर लेती और गर्भस्थ अभिमन्यु को बार बार सुनाकर पक्का कर देती और कुछ नहीं तो गूगल गुरू की मदद से सब कुछ हासिल करा देती।यह इन्टरनेट का ही कमाल है कि जो नीला पीला ज्ञान पहले युवकों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश पर भी उपलब्ध नहीं होता था ,वह अब आँख खोलते ही थोक में मिल जाता है।अब निश्छल,निष्पाप बचपन की कल्पना ही दुर्लभ होती जा रही है।गर्भावस्था में जब माँ ही रात दिन मोबाइल पर लगी रहती है तो बच्चे की डिमाण्ड गलत नहीं।चक्रव्यूह की तरह उसे भी मोबाइल के सारे फंक्शन पता हैं।नकली मोबाइल तो वो छूता ही नहीं दूर फेंक देता है।

पुराने जमाने में गरीब माँ बाप आठ दस  बच्चों को एक दूसरे की उतरन पहनाकर पाल लेते थे ।एक ही हँसली पायल से सबके शादी ब्याह निपटा लेते थे।अब डायपर कल्चर में  बच्चों  की डायरेक्ट जवानी में इन्ट्री से माता पिता के तनाव में वृद्धि हो गयी है।अब कानूनन उनकी पिटाई भी बाकायदा जुर्म है।ऐसे माहौल में  अब पैदा होते ही वे ब्राण्डेड माल की डिमाण्ड करने लगे हैं।पूरे कुनबे के खर्च में अब एक बच्चा पलता है।नर्सरी की फीस मेडिकल और इंजीनियरिंग के बराबर है।फरारी,लेम्बोर्गिनी जैसी एक से एक महंगी कारों और खिलौनों का काफिला भी  कमरतोड़ है।

मोबाइल प्रेम के विपरीत आधुनिक बच्चों को दुग्धपान और स्नान सख्त नापसंद है ।कन्हैया जी को चोटी बढने का लालच देकर मैया खूब दूध,दही,मक्खन  का सेवन करा देती थी।फिर तो वो खुद ही जंगल में दुहि पय पिबत पतूखी हो गये।आज के जमाने में चोटी और लंगोटी गुजरे जमाने के पिछड़ेपन की निशानियाँ हैं।कभी चोटी और लंगोटी बेहद नाजुक और छुईमुई होती थीं ।एक के कटते ही धर्म और और दूसरी को छूते ही चरित्र कभी न लौटने के लिये नष्ट हो जाते थे।हाथ का सच्चा और लंगोटी का पक्का ही हर क्षेत्र में आगे बढता था।अब इसका उल्टा है।इसीलिए कलिकाल में जीव दोनों से मुक्त है छुट्टा।वो तो अच्छा है कि  संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे की कल्चर में  अमूल ने मुश्किल से थोडी सी इज्जत बचा रखी है क्योंकि चीता भी पीता है की तर्ज पर मरगिल्ला से मरगिल्ला बालक भी एक आध बोतल पी ही जाता है लेकिन शुद्ध और कट्टर शाकाहारियों ने दूध को भी शाकाहार से बहिष्कृत कर दिया है।इसीलिए आधुनिक जसोदा जी ने अंडे से समझौता कर लिया है क्योंकि अब उसे शाकाहारी होने का लाईसेंस मिल गया है ।

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विभीषण और जयचन्द

विभीषण और जयचन्द का शीर्षासन 


# मूलचंद्र गौतम 

इतिहास की व्याख्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण काम है उसे बदलना।लोक में इतिहास ज्यादातर यों भी तथ्यों और तर्कों के बजाय मिथकों,जनश्रुतियों और अफवाहों पर चलता है।इसलिए उसे बदलना इतना आसान काम नहीं जितना समझा जाता है।इतिहास की द्वंद्वात्मक पद्धति कई बार उसे बदलने का काम जबरदस्ती करती है।मार्क्स ने  हीगेल को शीर्षासन कराया था ताकि लोग आदर्श  भावुकता से निकलकर यथार्थ  की दुनिया में आकर देखें कि उसकी असलियत क्या है।सत्ता ने इस पद्धति का भरपूर दुरुपयोग किया।सर्वहारा के नाम पर क्या क्या नहीं हुआ?यही हाल धर्म को लेकर हुआ तो जनता जाये तो जाये कहाँ ?

इसलिए अब  हर फील्ड में उल्टी गंगा बहाने वालों ने दुनिया को ठेके पर ले लिया है।तकलीफ इस बात से ज्यादा होती है जब पता चलता है कि राम के नाम पर सिक्का रावण का चल रहा है ।कलिकाल में घर का भेदी लंका ढाये ने बड़ा ऊटपटांग उत्पात मचा रखा है।पता ही नहीं चलता कि ऐसा कहनेवाले राम भक्त हैं या रावण भक्त?त्रेता में रावण से लातें खाने के बाद विभीषण ने राम के पक्ष में दलबदल किया था। क्या पता था कि बाद में राम के प्रति वफादारी का जिन्दगी भर बदनामी का यह इल्जामी  इनाम उसे मिलेगा कि  नाम इज्जत से लेना तो दूर कोई अपने बच्चे तक का नाम उसके नाम पर नहीं रखेगा।न रामराज्य में उसकी इज्जत होगी न रावण राज्य में।वह न घर का रहेगा न घाट का।

आधुनिक युग में यही दुर्गति राष्ट्रभक्तों के हाथों जयचन्द की हुई है।जिस प्रतापी पिता की बेटी को स्वयंवर से जबरिया उठा लिया गया हो उससे राजानिष्ठा की उम्मीद रखने वाले कितने अमानवीय हो सकते हैं, यह उसका जीताजागता उदाहरण है।उसे तो ऑनर किलिंग तक से वंचित कर दिया गया।ऐसे पिता की अपहरणकर्ता से क्या सहानुभूति हो सकती है ?लेकिन लोगों को तो हर बात में मजे चाहिए।सो आज तक गाली खा रहा है बेचारा पिता ।सच्चाई किसी को नहीं दिखती।

इन दोनों महान चरित्रों के साथ भारतीय जनमानस ने न्याय नहीं किया।इतिहास बदलने के नाम पर जब जगहों,इमारतों और रास्तों के नाम बदले जा रहे हों तो उम्मीद बंधती है कि सच्चे राम भक्त और राष्ट्र भक्त कम से कम अपने एक एक बच्चे का नाम इनके नाम पर रखेंगे और सदियों से होते चले आ रहे अन्याय को शीर्षासन करायेंगे।आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि नयी शिक्षा नीति में  पाठ्यक्रमों और मुहावरों में भी इन महान विभूतियों का सही उल्लेख किया जायेगा।

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झूठ बोलने वाली मोबाइल मशीन

झूठ बोलने वाली मोबाइल मशीन 

# मूलचंद्र गौतम 

आदिकाल में जब फोन लैंड लाइन होते थे तो साहब एक आदमी उस पर सफेद झूठ बोलने के लिये तैनात रखते थे जो फालतू खोपड़ी चाटने वालों को मौके के मुताबिक  निरंतर बताता रहता था कि साहब बाथरूम में हैं या पूजा कर रहे हैं।इससे साहब का रुतबा, रुआब बढ जाता था कि वे कितने व्यस्त और धार्मिक आदमी हैं।सतयुगी साहब की पूजा का सेशन भी तीन  घंटे से कम नहीं होता था और उनके हाथ में बंधा हुआ मोटा कलावा और तिलक ईमानदारी की गारंटी।घूसदाताओं को साफ हिदायत थी कि वे परस्पर के शुभ लाभ हेतु फोन करने के बजाय सीधे मिलें।

अब उत्तर आधुनिक युग में जबसे फोन मोबाइल हुआ है तबसे झूठ बोलने का  काम खुदबखुद यही करने लगा है।मोबाइल पर आदमी धडल्ले से झूठ बोलता है।होता कहीं है बताता कहीं है।इसी ने आदमी की कथनी और करनी में  फर्क पैदा कर दिया है।जब बात करने का पैसा लगता था तब कम बातें होती थीं  अब जिओ की कृपा से घंटों बकवास करते रहते हैं लोग।फालतू इंटरनेट पर चिपके रहते हैं।सोशल मीडिया तो हाइड पार्क हो गया है जहाँ हर किसी को हर तरह की आजादी है। इसने  तमाम लाज लिहाज और रिश्ते नातों को तार तार कर दिया है। 

अव्वल  तो ज्यादातर सरकारी मोबाइल फोन बीएसएनएल के होते हैं जो लाख कोशिशों के बाद भी मिलकर नहीं देते या तरह-तरह की निरुत्साहित करने वाली आवाजें निकालकर फोन करने वाले का हौसला पस्त कर देते हैं ।फिर वह हार कर, झख मारकर मुकद्दर को कोस कर चुप बैठ जाता है ।बहुत क्रांतिकारी हुआ तो फोन को पटक पटक कर तोड डालता है - जा तेरी ऐसी की तैसी।

बाबा ने पहले ही घोषित कर दिया था कि कलिकाल में झूठ का ही साम्राज्य होगा।झुठइ लेना झूठइ देना ,झूठइ  भोजन झूठ चबेना।जो कह झूठ मसखरी जाना कलियुग सोइ गुनवंत बखाना।ऊपर से नीचे तक सब झूठे,मक्कार और लबार  ।कलियुग केवल नाम अधारा,सो सत्य केवल नाम में रह जायेगा।भले इंसानियत का राम नाम सत्य हो जाये  और खुद राम जी चीखते चिल्लाते रहें मोहि कपट,छ्ल छिद्र न भावा ।इसलिए नाम जप ही मोक्ष की गारंटी होगा।राम जी विवश होंगे पापियों के उद्धार के लिये।इसीलिए आजकल पापियों में ही उनकी डिमांड ज्यादा है ।

मजे की बात यह है कि देश विदेश में  झूठ के लिए अंग्रेजी सबसे ज्यादा मुफीद भाषा होगी।इसीलिए शिक्षा ,कानून और चिकित्सा का सारा कारोबार आज अंग्रेजी में है। शासक और शासित की भाषाओं में फर्क की वजह से दलालों का बोलबाला है।इसीलिए गांधीजी खुद बैरिस्टर होते हुए भी अंग्रेजीदाँ वकीलों और डाक्टरों को पसंद नहीं करते थे।हिंदी समेत भारतीय भाषाएँ अपने देसी चरित्र में न झूठ बोल सकती हैं ,न झेल  सकतीं हैं ।इसलिए उनके सारे भाषी तथाकथित अंग्रेजी विकास और विकल्प की दौड़ में हमेशा के लिये पिछड़ चुके हैं।

फिर भी आंशिक सत्य की रक्षार्थ समर्पित योद्धाओं ने लाई डिटेक्टर उर्फ झूठ पकड़ने की मशीन ईजाद कर ली है भले ही पेशेवर झूठों पर वह कारगर न हो।सत्य और असत्य के बीच के सनातन संघर्ष की सच्चाई न सही ड्रामा तो चलते रहना चाहिए।तभी तो सत्यमेव जयते में जनता की आस्था बनी रहेगी भले पंच परमेश्वर न्यायमूर्ति बिकाऊ हों।यों भी ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। ऐसे में भी अगर आप एक सिमधारी हैं तो कोई झूठ,फरेब आपको बचा नहीं सकता भले आपका फोन कोई सा भी हो ।आखिर मोबाइल की कीमत से मालिक की औकात पता चलती है।सर्विलांस से कॉल और व्हाट्सएप का रिकार्ड सैटेलाइट की तरह आपको पाताल से भी खोज लेगा।आधुनिक रक्तबीज सद्दाम और लादेन तक इससे नहीं बच पाये।आपका क्या होगा जनाबे आली?

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