Saturday, June 22, 2024

एक असफल और कुण्ठित कवि की खुजली




# मूलचन्द गौतम
भारत में जब से ऋषियों और कवियों के बीच फर्क आया तभी से गडबडी की शुरुआत हो गयी थी .ऋषि –मुनि इतने सात्विक प्रवृत्ति के होते थे कि उन्हें किसी भी प्रकार का विकार नहीं होता था .इसीलिए उन्होंने हमेशा सार्वकालिक,सार्वभौमिक सत्यों और तथ्यों की रचना की ,जबकि कवियों के आते ही चारों ओर विकृतियों का बोलबाला हो गया .कविता के रस को ब्रह्मानंद सहोदर बताने वालों ने कवि को भी ब्रह्म बता दिया तभी से हर छुटभैया भ्रम में बौराया घूमने लगा है .उसे अपने आगे कोई जँचता ही नहीं .कवि न होऊं नहिं चतुर कहावों की विनम्रता उसे छू तक नहीं गयी है .हमारे शहर में पांच –सात चेले चेलियों चपाटों को लेकर घूमने वाले भंगड कवि शान से खुद को कवि कुल गुरू कहलवाते थे .इसे सुनकर कालिदास ने स्वर्ग में आत्महत्या का प्रयास किया था क्योंकि उन्हें कवि और कवियशप्रार्थी का अंतर मालूम था ।वो तो राष्ट्रकवि ने कविता को सहज सम्भाव्य बना कर गड़बड़ की ।तभी से निरर्थक कवियों की फौज खड़ी हो गयी है ।

वास्तव में आदिकवि को भले ही त्रेतायुग के नायक को काव्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय मिला हो लेकिन रावण के रूप में महान खलनायक भी उन्हीं की देन है .वैदिक युग में देव और दानवों में वर्चस्व का युद्ध जरूर था लेकिन महिलाओं को लेकर कोई बड़ा फसाद नहीं हुआ था . स्मृतियों ने इस सम्पूर्ण घपले को संस्थानिक कानून का रूप दे दिया था जिसके लिये आज भी ब्राह्मण समाज जूते खा रहा है .द्वापर में व्यास ने तो महिलाविषयक अनैतिकता को पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया .कलिकाल उसी का परम विस्तार है कि आदमी और जानवर का फर्क मिट चुका है .बाबा तुलसीदास के कलिकाल वर्णन में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है .धर्म और समाज का वह विकृत चेहरा और अधिक विरूप होता जा रहा है .नहिं मानहिं कोउ अनुजा तनुजा .
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भारत के अंतिम नैतिकतावादी आलोचक और इतिहासकार थे .उन्हें नैतिक स्खलन कतई पसंद नहीं था .जीभ और जांघ के चालू भूगोल और उसे बढ़ावा देने वाले मकरध्वज के कारण ही उन्हें रीतिवादी दरबारी कवि पसंद नहीं थे .डॉ रामविलास शर्मा ने उनकी इस पहली परम्परा का विस्तार किया .उन्हें भाभीवादी जम्पर उतार लेखन से सख्त घृणा थी .इन्हीं और इसी तरह के कवियों को उन्होंने जी भरकर धोया लेकिन उनका वंशनाश नहीं हो पाया .प्रभाष जोशी ने भी दारूकुट्टों की जमात की खूब खबर ली थी लेकिन साहित्य उनका प्राथमिक सरोकार नहीं था ,इसलिए वे कभी कभार नैतिक हस्तक्षेप भर करते थे .
आजादी के बाद दाद ,खाज ,खुजली , मौसमी मक्खी- मच्छर और खरपतवार की तरह उत्पन्न साहित्य और साहित्यकारों की जमात में संत कवियों की स्थिति आज भी वटवृक्ष की तरह है क्योंकि वे किसी सीकरी के चक्कर में नहीं पड़े  .उनकी छाया और परम्परा में विकसित साहित्य की धारा  गंगाजल की तरह पवित्र नहीं रही है क्योंकि खुद गंगा बेहद प्रदूषित हो चुकी है .उसमें तमाम गंदे नाले ,नालियों का पानी प्रवेश कर चुका है .तथाकथित धर्मनिरपेक्षता तथाकथित संकीर्ण राष्ट्रवादी हिंदुत्व में रूपांतरित हो चुकी है .गांधीजी के दौर का हिंदी ,हिन्दू ,हिन्दुस्तान गायब हो गया है .प्रेमचन्द का गोदान और गोबर लुम्पेन हो गये हैं .कोई सत्य सुनने को तैयार नहीं .सब अपने अपने अर्धसत्यों की सलीब ढो रहे हैं .ऐसे हताश ,निराश माहौल में किसानों के बाद आत्महत्या करने वालों की जमात में सच्चे साहित्यकारों और कलाकारों का नम्बर लगने वाला है .टुच्चे अवसरवादियों ने तो पनाहगाह ढूंढ लिये हैं और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला .सरकारी और दरबारी चक्रधारी किसी सत्ता के लिए चुनौती नहीं होते .सत्ता को डर सिर्फ विरोधी और विद्रोही कवियों से लगता है .सो उन्हें ठिकाने लगाना शुरू हो गया है .सफदर हाशमी से कलबुर्गी तक के उदाहरण मौजूद हैं . उन्हें चुन चुनकर मारेंगे.अब जिन कवियों को सरफरोशी की तमन्ना है वे आएं सामने लिंचिंग के लिए वरना छिपे रहें चूहों की तरह अपने बिलों में .
प्लेटो ने अपने लोकतंत्र से कवियों को यों ही बाहर नहीं किया था .उन्हें मालूम था कि कवि ही लोकतंत्र की आड़ में खड़े किसी तानाशाह को हिला सकते हैं .भारत में भी ऐसा ही काम असहिष्णुता गैंग ने पुरस्कार वापसी के रूप में किया था जिसका धार्मिक हिन्दू जनता ने कोई नोटिस नहीं लिया .अमेरिका में भी नोम चोमस्की से कौन डरता है .भौंकते रहते हैं ऐसे लोग और लोकतंत्र की सवारी निकल जाती है शान से .शतरंज के खिलाडी आपस में कट मरते हैं .साहित्य की तमाम विधाओं में कविता आदिम विधा है सो कवि बहुसंख्यक हैं .  सोशल मीडिया ने कविता की अपार सम्भावनाओं के द्वार खोल दिये हैं ।चारों तरफ से कविता की बौछारें पड़ रही हैं ।अनुस्वार लगन्तम संस्कृत बनंतम की तर्ज पर हर तुक्केबाज कवि हो गया है ।जैसे शादी ब्याह में हर उछल कूद भांगड़ा।गाडी और घर पर सत्ताधारी पार्टी का झंडा पतुक्की लगाये ,हाथ में मोटा कलावा और अंगोछा डाले नेताओं की तरह हर मोहल्ले में दस पांच बाल और नाख़ून बढाये  प्राणी मिल ही जायेंगे .समझ लो यही कवि हैं . सुबह शाम यह जमात कहीं न कहीं तिराहे चौराहे पर अठखेली , बकलोली ,वक्तकटी करते हुए मिल ही जायेगी.चौंचे लडाते बाल की खाल निकालने में माहिर महान कवि दिल्ली में  इंडिया इंटरनेशनल सेंटर या रवीन्द्र भवन के आस पास पाये जाते हैं . इनके बीच सबसे ज्यादा फजीहत अल्पसंख्यक आलोचकनुमा प्राणी की होती है .ये उसे देखते ही कौए और गिद्ध की तरह टूट पड़ते हैं .शुक्लजी ने इस तरह के असंतुष्ट विघ्नसंतोषियों के लिए एक फुटकल खाता बना रखा था जिसमें ये अपना नाम देखकर खुश होते रहते थे .इसलिए नये आलोचकों को उसी तर्ज पर एक रेडीमेड डिजिटल खाता तैयार रखना पड़ता है मन राखन तेल की तरह जो हर कवि और उसके हर संग्रह पर फिट बैठता है .सिर्फ नाम बदलने भर की देर है .इसी डिजिटल कला से वह नाग नथैया लीला करता रहता है .वरना उसकी खैर नहीं .
निराला , मुक्तिबोध, धूमिल और पाश ने भारत महान के लोकतंत्र को क्या क्या भला बुरा  नहीं कहा लेकिन उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाये तो ऐरे गैरे क्या कर लेंगे ? अब कोई कवि संतई के लिए कविता नहीं करता .अर्थ उसका परम पुरुषार्थ है .अर्थार्जन में असमर्थ कवि अर्थार्थी को निकृष्ट कवि ठहराकर अपनी श्रेष्ठता की खुजली मिटाते हैं .हिंदी में कविसम्मेलनी कवि को बड़ी ही नीची निगाह से देखा जाता है जबकि मुशायरों में जाने /गाने वाले शायरों की इज्जत में कोई कमी नहीं आती .किसी कवि के गीत फिल्मों  मेंं आ जायेें तो बल्ले बल्ले ।लाटरी ही लग गयी मानो. गुलजार और निदा फाजली की तरह साहित्य सधे न सधे.कवि को प्रकाशक ,पाठक और श्रोता से जो उपेक्षा मिलती है , उसे झेलना हर किसी के बस की बात नहीं .लोग कवि को जोकर और मसखरे से ज्यादा कुछ नहीं समझते जो भवभूति जैसे महान कवि की कीमती सलाह की उपेक्षा करके जरा सा किसी कुपात्र के कहने भर से अपनी कविताएँ सुनाने लगता है.तारसप्तक तक जिस भाषा में कवियों के चंदे उर्फ़ आर्थिक सहयोग से छपा हो उसका भगवान ही मालिक है .वो तो भला हो अशोक वाजपेयी का जो कविता की वापसी के दौर में बड़े बड़े तुर्रमखां कवियों को घास पड़ गयी और उनके संग्रह प्रकाश में आ गये अन्यथा जाने कितना महान साहित्य कूड़े कतवार में ही गुम हो जाता.अब के कवि तो टुच्चे से टुच्चे प्रकाशकों की दुम सहलाते रहते हैं कि पैसा लेकर ही उन पर कृपा बरसा दें . संग्रह छप भी जाय तो फिर शुरू होता है उसके लोकार्पण ,समीक्षा ,पुरस्कार और चर्चाओं का दौर .रजिस्ट्री ,स्पीड पोस्ट ,कोरियर में खर्चा करके भिजवाये संग्रह की कोई पावती तक नहीं देता तो कवि खिसिया जाता है और जमाने भर को कोसने लगता है .तमाम लोग उससे बचने लगते हैं ,रास्ता काट कर निकल जाते हैं .बचो कवि आ रहा है राह चलते चार छह कविताएँ सडक पर ही पेल देगा .सबसे ज्यादा दुर्गति उस कवि की होती है सत्ताधारी नेताओं पर चालीसा लिखता है ,थोड़ा बहुत पैसा और यश भारती मिले तो ठीक अन्यथा उसके पागल होने में कोई शक ही नहीं .सिर धुनि गिरा लागि पछिताना वाली स्थिति हो जाती है .उसके परिवारीजन परेशान हो जाते हैं कि बुढाऊ को बैठे ठाले ये क्या रोग लग गया .सचमुच उपेक्षा से बड़ा कोई दंश नहीं .इसलिए कवि परस्पर ही प्रशंसा करके दाद ,खाज , खुजली मिटाने का उपक्रम करते रहते हैं . सबसे मजे में रहते हैं हास्य व्यंग्य के कवि हर माहौल में फिट .कामेडी शो में कोई झंझट नहीं .हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा .एक महान कवि ने तो पत्थरनुमा चेहरे से अपनी घरवाली पर कविताएँ लिख लिखकर हास्यास्पद सम्राट की पदवी और अकादमी की अध्यक्षता प्राप्त कर ली है . भारत की राष्ट्रवादी राजनीति की तरह वीर रस के कवियों का स्थायीभाव कश्मीर और पाकिस्तान है .जरूरत कविता के प्रोफेशनलिज्म की है .इसीलिए अफसर कवि के मजे रहते हैं .कविता की आड़ में काम से मुक्ति और तफरीह मुफ्त में .सब समझते हैं कि ग़ालिब की तरह  कवि किसी काम का जीव नहीं . बस सूरज अस्त और कवि मस्त .अब कोई कुआं तो प्यासे के पास आने से रहा तो मरो घुट घुट के .कवि कोई सांसद,विधायक भी नहीं कि कोई दल बदल के लिए उसकी चिरौरी करेगा .यों भी कवियों का कोई मजबूत संगठन भी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उन्हें इकट्ठा करना मेढकों को तराजू में तौलने जैसा कठिन बल्कि असम्भव कर्म है। भारत सरकार हिंदी के हित में कुछ करने में भले असमर्थ हो लेकिन अटलजी से लेकर मोदीजी तक ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषणों का झंडा जरूर बुलंद कर दिया है ।हर हिन्दू इतने भर से बम बम है ।कुछ स्वयंसेवकनुमा  चतुर सुजान हिंदी भक्तों ने पर्यटन के बहाने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय बनाने का पराक्रम अपना लक्ष्य बना रखा है ।इसमें भी कवियों का योगदान सबसे ऊपर है ।देश में भले उनको चार श्रोता न मिलते हैं विदेश में कविता सुनाने का सुख उनको मोक्ष समान है ।दस दस साल पुराने काव्य संग्रहों को जिस ललक से कवि पेश करते हैं ,वह दर्शनीय है ।पुराने कवियों को अपना सम्पूर्ण वांग्मय कण्ठस्थ रहता था ।नये कवि को अपनी दो कविताएं भी याद नहीं रहतीं ,उसे कहीं तत्काल काव्यपाठ के लिये कहा जाय तो बगलें झांकने लगेगा,इसलिए उसे हर समय संग्रह या डायरी साथ रखने पड़ते हैं ।
जब तक यह स्थिति सुधर नहीं जाती तब तक देश भर के  व्यवस्था विरोधी कवियों कलाकारों को आपस में सिर फुटब्बल और जूतमपैजार के बजाय  अपनी कविता को चार्ली चैपलिन,ब्रेख्त और लोर्का की तरह  जनता के बीच मजबूत  विकल्प के रूप में ले जाना चाहिए अन्यथा यह खुजली मिटने वाली नहीं है .कविता से क्रांति हो सकती है इसकी थोड़ी सी जिम्मेदारी और जोखिम तो कवियों को सामूहिक रूप में उठाने होंगे .
# शक्तिनगर,चन्दौसी ,संभल 244412 मोबाइल-9412322067


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