डबल बैड और दो गज की दूरी
# मूलचंद्र गौतम
जिस व्यक्ति ने भी प्रथम बार डबल बैड की कल्पना और आविष्कार किया उसे निश्चित ही नोबेल मिलना चाहिये।इस डबल बैड ने भारत की मजबूत संयुक्त परिवार की लाज लिहाज की प्रथा की जड़ों में मट्ठा डाल दिया।यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रारंभ था।हालांकि जब परिवार नियोजन के कोई साधन उपलब्ध नहीं थे तब भी प्राकृतिक रूप से हर घर में एक कबड्डी और क्रिकेट की टीम तैयार हो जाती थी जो बाद में पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे को लेकर महाभारत रच देती थी ।डबल बैड कल्चर ने कम से कम पति पत्नी के बीच स्वेच्छा से यह समझ तो पैदा कर दी कि उन्हें अपने आप लगने लगा दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे।अब चीन भी भारत के पदचिन्हों पर चलने लगा है।यह बात अलग है कि भारत में ये नारा देने वाले तत्कालीन यूथपतियों और दलपतियों के जबरिया नसबन्दी के काम ने सरकार के परखच्चे उडा दिये।
कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल पार्क का नजारा जिन्होंने नहीं देखा वे नहीं जान सकते कि डबल बैड के आयतन के बराबर की कुठरिया में भरे-पूरे परिवार के बीच पति पत्नी को गुटुर गूँ करने का भी मौका नहीं मिलता।इसलिए वे मौका पाते ही फुर्र हो जाते हैं और उन्हें तल्लीनता में घण्टों पता ही नहीं चलता कि आसपास क्या हो रहा है।
लेकिन बुरा हो इस कोरोना काल का जिसने बड़ों बड़ों के डबल बैड को सिंगल बना दिया है।हर सुगृहिणी पति को हर समय दो गज दूरी की हिदायत पुलिसिया अंदाज में देती रहती है।यहाँ तक कि बायोडाटा में सिंगल दिखाकर एक साथ चुनौती और चेतावनी देती रहती है जैसे फेरों के समय सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा करने वाली कोई और थी।अब झण्डू बाम वाली हीरोइन उनकी माडल है।जैसे पति को निहायत निकम्मा और फालतू सिद्ध करने का इससे बड़ा सुनहरा कोई मौका जिन्दगी में कभी मिलता ही नहीं।
इंटरनेट ने इस आपदा में सोने पर सुहागे का काम किया है।जब देखो श्रीमतीजी इंटरनेट पर सखी सहेलियों,मायके वालों से चैटिंग में लगी हैं।काल की कोई सीमा ही नहीं।चाय नाश्ते खाने का कोई समय ही नहीं।इंटरनेट ने उनके सामने एक ऐसी दुनिया खोल दी है जहाँ सब कुछ भी करने के लिये सर्व स्वतंत्र हैं,किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं ।जगत और उसके सारे सम्बंध मिथ्या हो गये हैं।हाथ मिलाना ,बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना गुनाह हो गया है।घर का हर सदस्य होम आइसोलेशन के मजे ले रहा है ,यूट्यूब देख देखकर फाईव स्टार कुक हो गया है।किसी के पास किसी के लिये कोई वक़्त नहीं।सब जैसे एक दूसरे को खा जाने वाली निगाहों से घूर रहे हैं मानो विश्व की इस महामारी का एकमात्र कारण वही हों ।व्यक्तिवादी अस्तित्व और अस्मिता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा जिसने सार्त्र,कामू और काफ्का के दर्शन को फेल कर दिया है।
# शक्ति नगर,चंदौसी,संभल 244412
मोबाइल 8218636741
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