# मूलचंद्र गौतम
ऊंट के मुंह में जीरे की कल्पना जिस लोक मानस में उभरी होगी उसने मात्रा पर ध्यान नहीं दिया होगा. उसे जनमानस की सहज बुद्धि और विवेक पर भरोसा रहा होगा कि जीरे का मतलब एक दाने से है चार छह सेर या बोरी दो बोरी से नहीं. ऊंट ने कभी मुंह खोलकर दिखाया भी नहीं कि उसके मुंह में कितना जीरा है. एक दाने से अल्प मात्रा का बोध होता है जो ऊंट के लम्बे चौडे शरीर के लिए अपर्याप्त है. जैसे बंदर को अदरक के स्वाद से कोई मतलब नहीं वैसे ऊंट को जीरे से. ये तो आदमी ने जीरे के छौंक बघार को ईजाद किया है और उसके औषधीय गुणों की खोज की है, ऊंट पर तो यह खामख्वाह तोहमत की तरह चिपका दिया है जो आज तक फेविकोल के पक्के जोड की तरह छूटने का नाम ही नहीं ले रहा. ऊंट बार-बार गर्दन को झटक रहा है लेकिन जीरा है कि पीछा ही नहीं छोड रहा. वह परेशान है कि यह किसी जीरे के थोक विक्रेता की छिछली विज्ञापनी बदमाशी नहीं जिसमें उसे जन्म जन्मांतर तक फंसा दिया हो. गधे की तरह वह अपनी आत्मकथा भी नहीं लिख सकता.
दरअसल रेगिस्तान का जहाज माने जाने वाले संतोषी जीव ऊंट को जीरे की कभी जरूरत ही नहीं पडी. वह तो कीकर, खेजडी जैसे उपेक्षित पेड़ों से अपनी भूख मिटा लेता है.कुदरत ने उसे लम्बी गरदन का जो वरदान दिया है उससे उसे कभी भूखा नहीं मरना पड़ेगा. वह किसी भी गंदे संदे जोहड से हफ्ते दो हफ्ते की प्यास का इंतजाम कर लेता है. वह कोई हाथी थोडे है जिसे डेली मनों खाने को चाहिए और कुंटलों बिगाड़ने को.आदमी ने जब से उसे पालतू बनाकर उसकी नाक में नकेल डाली है तब से वह परवश और असहाय हो गया है. अब भी उसे किसी अपमानजनक बात पर गुस्सा आ जाय तो कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता. आदमी की खोपड़ी चबाने में और लतियाने में उसे एक मिनट भी नहीं लगता और दौडने में कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता.छब्बीस जनवरी की परेड में उसकी कम्पनी की धज अलग ही होती है.
पर धन्य है आदमी की व्यावसायिक बुद्धि जिसने सृष्टि के हर पद पदार्थ और जीव जन्तु का दोहन किया है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने तो उसमें आठ चांद लगा दिए हैं. सहस्रबाहु और सहस्रनेत्र को योजनों पीछे छोड दिया है. अमरीका जो एक जमाने में पाताल था अब स्वर्ग से भी ऊपर है. दुनियाभर में उसका डंका बजता है.
ऊंट को बिसलेरी पिलाने का खयाल किस विज्ञापन गुरू का कमाल है यह शोध का विषय है. यह मामला सीबीआई और ईडी को सौंपा जाना चाहिए. क्या इसमें ऊंट की मर्जी थी या उसका मालिक मंहगे विज्ञापन के लिए किसी अन्य कोल्ड ड्रिंक, साफ्ट ड्रिंक, काकटेल, माकटेल के संपर्क में था. इस विज्ञापन की रायल्टी का भुगतान किसे किया गया. क्या यह मनी लांड्रिंग का कोई नया आविष्कार है. विज्ञापन का ऊंट असली है या इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार किया गया और उपभोक्ताओं को केवल बिसलेरी की ओर जबरन आकर्षित किया गया. साथ ही यह कांट्रेक्ट कितने साल का है. यह केवल एक ऊंट का कांट्रेक्ट है या पूरी बिरादरी का?क्योंकि इसके बाद किसी अन्य ऊंट का कोई विज्ञापन दिखाई नहीं दिया. पशुप्रेमी अब तक इस महत्वपूर्ण मामले पर चुप क्यों हैं?क्या सुप्रीम कोर्ट को इस अहम मामले का स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए?या इसके लिए भी कोई जेन जी टाइप ऊंट जनता पार्टी बनानी पडेगी?
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