सावन के अंधे और मोतियाबिंद में संशोधन
#मूलचंद्र गौतम
सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है तो भादों के अंधे को क्या सब काला काला दिखता है तो बाकी के महीनों के अंधों की क्या स्थिति है कुछ पता नहीं चलता।वैसे भी आदमी के पास चार आँखें होती हैं दो मिलाने
को ,दो लडाने को ।दो भीतर की दो बाहर की ।यही अंतर्दृष्टि और बाह्य दृष्टि है जिनके समन्वय और सन्तुलन से दृष्टिकोण बनता है।जिनके पास एक भी नहीं होती वास्तव में वही अंधे हैं ,महीना उनके साथ कोई सा जोड़ दो क्या फर्क पडता है ।वैसे भी वैचारिक मोतियाबिंद के धुंधलके से भी कम भ्रम नहीं होता।इसलिए अकल का अंधा ही असली अंधा है।
भारतीय लोक भी गजबे है।कहां कहां की दूर की कौड़ियों से भरा पडा है।काने को दरोगा कहने वाले अंधे को सूरदास कहकर आदर देते हैं भले ही वे प्रज्ञा चक्षु हों।आंखों के अंधे नाम नयनसुख।अंधे के आगे रोवे अपने नैना खोवे।अब किसने कहा कि रोओ और आन्दोलन करो ।ये बीमारी गांधी बाबा की लगाई हुई है।कोई कह मरा था क्या जबकि पुराने बाबा ने पहले ही आगाह कर दिया था अंधा अंधे ठेलिया दोनों कूप पडन्त।अब नयी लोकतांत्रिक जनता ही बहरी है तो कोई क्या करे? राजतंत्र की पुरानी जनता ज्यादा सुखी थी जिसे मालूम था कि कोई होइ नृप हमहिं का हानी...
दरअसल कलियुगी जनता जब सतयुगी फार्मूलों पर चलती है तो ऐसा ही होता है।वह पहचान नहीं पाती कि कलियुगी नेताओं के मन में क्या और वचन में क्या और उनका कर्म किधर जा रहा है ।वो तो भला हुआ कि राजा रामचंद्र जी के जमाने में सुप्रीम कोर्ट नहीं था वरना सात पुश्तों तक कैकेयी के तलबे घिस जाते और उन्हें कोई वनवास नहीं होता।तब रामलीला कुछ और ही होती।रामकथा वर्णन के लिये वाल्मीकि और तुलसी की कोई जरूरत ही नहीं पडती।सारा मामला वकीलों और दलीलों में फँसकर रह जाता।
पूरी दुनिया में समस्या की जड़ में यही लोकतंत्र है जो राजतंत्र में घुसकर उसे बर्बाद कर रहा है।राजतंत्र राजा के वंश ,बल और विवेक से चलता है जिसके नष्ट होते ही वह नष्ट हो जाता है जबकि लोकतंत्र में बहुमत के द्वारा चुना गया नेता जब खुद को निरंकुश राजा समझने का भ्रम पालने लगता है तो जनता जल्दी उसे गद्दी से उतार देती है।अमेरिकी जनता चुपचाप ट्रम्प को आजीवन राजा मान लेती तो कोई बबाल नहीं होता।हर जगह की जनता को चुनाव का चस्का लग चुका है।उसे प्रयोगों के बिना मजा ही नहीं आता इसके लिये चाहे उसे लोहे के चने ही क्यों न चबाने पड़ें।चीन में चुनाव होने लगें तो वहाँ भी यही नंगा नाच शुरु हो जायेगा।कोई अक्लमंद शासक और व्यापारी अपना विकल्प नहीं उभरने देना चाहता ।लोकतंत्र इसी एकाधिकार और विशेषाधिकार को चुनौती देता है।हर संविधान और कानून को वह अपनी तरह इस्तेमाल करता है और उसकी मनमाफिक व्याख्या करता है,जो भी व्यक्ति और तत्व इसमें बाधक होते हैं उनके पीछे तरह तरह के छ्छुंदर छोड देता है।
इसलिए संविधान और कानून अपरिवर्तनीय नहीं है उनमें यथावश्यक संशोधन होते रहते हैं।ये भी चुनाव में बहुमत जुगाडने का औजार है।जैसे कोई पुराने उबाऊ ,बासी फैशन और चुटकुले सुनना पसंद नहीं करता वही हाल व्यवस्था का है।जनता को सब कुछ लचीला और ताजा चाहिए ।युवा तो वैसे भी अग्रगामी है उसे पुरानी प्रतिक्रियावादी सड़ी गली चीजें नहीं जंचतीं।इसीलिए अमेरिका उसका मक्का मदीना है।
इसीलिए अब पुरानी भारतीय लोकोक्तियों और मुहावरों को भी बदलने की जरूरत है।कुछ पुरातन लोग उन्हें संग्रहालयों में सुरक्षित रखना चाहते हैं तो रखें।वॉट्सएप्प के नये से नये जोक्स बाजार में उन्हें पीट देंगे ।युवाओं को पता ही नहीं कि सावन क्या होता है कि रतौंध किस बीमारी का नाम है और मोतियाबिन्द क्या बला है ?
# शक्ति नगर,चन्दौसी,संभल 244412
मोबाइल 8218636741
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