मैया मैं तो मोबाइल ही लैहों
# मूलचंद्र गौतम
सूरदास आज होते तो उन्हें कृष्ण की बाललीला में अनेक संशोधन करने पडते।उनके आराध्य को परम प्रिय माखन और मलाई दो नंबरी मोटी घूस के पर्याय हो चुके हैं।सीबीआई मैया अब कृष्ण को थर्ड डिग्री देकर आत्मस्वीकृति करवाकर उगलवा लेगी कि मैने ही माखन खायो।ग्वाल बाल साफ बच जायेंगे।
इसी तरह अव्वल तो बालकृष्ण मैया से चन्द्र खिलौना की जगह मोबाइल की डिमांड करते क्योंकि उन्हें मालूम होता कि चौदहवीं का चांद दूर से जितना खूबसूरत दिखता है पास से उतना ही बदसूरत है।दूसरे मैया को भी अब चंदा भैया उतने प्यारे नहीं लगते जितने पहले थे।पिता की सम्पत्ति में बराबर की हिस्सेदारी ने भाई बहिन के फिल्मी प्यार में गाँठ डाल दी है,तो लाल कृष्ण के मन में भी खुद थाली भरकर पुए खाने वाले चन्दामामा का भेदभाव प्याली में साफ दिखता है।इसने राखी के पवित्र निस्वार्थ रिश्ते में आजीवन मुकदमेबाजी का रास्ता खोल दिया है।इससे रक्षाबंधन और भाई दूज जैसे त्यौहार सिर्फ दिखावे के लिये इसलिए चल रहे हैं क्योंकि इन दो दिनों में सरकार बहनों को अपनी बसों में यात्रा की मुफ्त सुविधा देती है इस बहाने बहनों को भी भाईयों से भात, छोछ्क की गारंटी बनी रहती है।इस टोटके से हर सरकार को बहनों का वोट और समर्थन भी मुफ्त में मिल जाता है।
आधुनिक युग में चंद्रमा और मोबाइल के तुलनात्मक विश्लेषण में मोबाइल का पलडा भारी पडता है।यों भी अब जब चाँद पर बस्ती बसाने की बात हो रही है तो बिना सेटेलाइट फोन के तो बात हो नहीं पायेगी।सुभद्रा के जमाने में मोबाइल होता तो चक्रव्यूह में फँसकर अभिमन्यु की हत्या न होती।सुभद्रा चक्रव्यूह भेदन के बारे में अर्जुन उवाच को रिकार्ड कर लेती और गर्भस्थ अभिमन्यु को बार बार सुनाकर पक्का कर देती और कुछ नहीं तो गूगल गुरू की मदद से सब कुछ हासिल करा देती।यह इन्टरनेट का ही कमाल है कि जो नीला पीला ज्ञान पहले युवकों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश पर भी उपलब्ध नहीं होता था ,वह अब आँख खोलते ही थोक में मिल जाता है।अब निश्छल,निष्पाप बचपन की कल्पना ही दुर्लभ होती जा रही है।गर्भावस्था में जब माँ ही रात दिन मोबाइल पर लगी रहती है तो बच्चे की डिमाण्ड गलत नहीं।चक्रव्यूह की तरह उसे भी मोबाइल के सारे फंक्शन पता हैं।नकली मोबाइल तो वो छूता ही नहीं दूर फेंक देता है।
पुराने जमाने में गरीब माँ बाप आठ दस बच्चों को एक दूसरे की उतरन पहनाकर पाल लेते थे ।एक ही हँसली पायल से सबके शादी ब्याह निपटा लेते थे।अब डायपर कल्चर में बच्चों की डायरेक्ट जवानी में इन्ट्री से माता पिता के तनाव में वृद्धि हो गयी है।अब कानूनन उनकी पिटाई भी बाकायदा जुर्म है।ऐसे माहौल में अब पैदा होते ही वे ब्राण्डेड माल की डिमाण्ड करने लगे हैं।पूरे कुनबे के खर्च में अब एक बच्चा पलता है।नर्सरी की फीस मेडिकल और इंजीनियरिंग के बराबर है।फरारी,लेम्बोर्गिनी जैसी एक से एक महंगी कारों और खिलौनों का काफिला भी कमरतोड़ है।
मोबाइल प्रेम के विपरीत आधुनिक बच्चों को दुग्धपान और स्नान सख्त नापसंद है ।कन्हैया जी को चोटी बढने का लालच देकर मैया खूब दूध,दही,मक्खन का सेवन करा देती थी।फिर तो वो खुद ही जंगल में दुहि पय पिबत पतूखी हो गये।आज के जमाने में चोटी और लंगोटी गुजरे जमाने के पिछड़ेपन की निशानियाँ हैं।कभी चोटी और लंगोटी बेहद नाजुक और छुईमुई होती थीं ।एक के कटते ही धर्म और और दूसरी को छूते ही चरित्र कभी न लौटने के लिये नष्ट हो जाते थे।हाथ का सच्चा और लंगोटी का पक्का ही हर क्षेत्र में आगे बढता था।अब इसका उल्टा है।इसीलिए कलिकाल में जीव दोनों से मुक्त है छुट्टा।वो तो अच्छा है कि संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे की कल्चर में अमूल ने मुश्किल से थोडी सी इज्जत बचा रखी है क्योंकि चीता भी पीता है की तर्ज पर मरगिल्ला से मरगिल्ला बालक भी एक आध बोतल पी ही जाता है लेकिन शुद्ध और कट्टर शाकाहारियों ने दूध को भी शाकाहार से बहिष्कृत कर दिया है।इसीलिए आधुनिक जसोदा जी ने अंडे से समझौता कर लिया है क्योंकि अब उसे शाकाहारी होने का लाईसेंस मिल गया है ।
# शक्ति नगर,चंदौसी,संभल 244412
मोबाइल 8218636741
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