विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था के ढ़ोल की पोल वाया जर्मनी
# मूलचंद्र गौतम
जब से भारत के विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की चर्चा चली है तब से इस की वास्तविकता को परखने की जरूरत महसूस होने लगी है कि यह केवल हवा हवाई जुमला है या इसका कोई ठोस तथ्यात्मक आधार भी है.इसकी तुलनात्मक जरूरत तब और ज्यादा महसूस हुई जब विश्व की घोषित तीसरी अर्थव्यवस्था वाले देश जर्मनी जाना हुआ.
यों तो योरप यात्रा में पांच साल पहले 2019 में एक पर्यटक के तौर पर जर्मनी की आर्थिक राजधानी म्यूनिख जाना हुआ था और वहाँ ओलम्पिक स्टेडियम के साथ बीएमडब्ल्यू टावर की भव्यता का अनुभव हुआ था. गुणवत्तायुक्त कार निर्माण के केंद्र जर्मनी में वहाँ की सडकों की गुणवत्ता का विशेष योगदान है.सभी वाहन वहाँ जिस तरह फर्राटेदार गति से बिना किसी जाम के गुजरते हैं वह किसी आश्चर्य से कम नहीं.निश्चित समय के बाद अनफिट कारों के विशालकाय ढेरों को देखकर विश्वास नहीं होता कि उनका पुनर्निर्माण भी होगा.यह परफेक्शन वहाँ की हर वस्तु, व्यवस्था और व्यक्ति में मौजूद है.तब वहाँ के सामाजिक जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति को विस्तार से जानने-समझने और नजदीक से देखने की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई थी.
अब की बार लगभग दो महीने के बर्लिन प्रवास में विश्व की तीसरी अर्थ व्यवस्था को नजदीक से सम्पूर्ण रूप से अनुभव करने का पर्याप्त अवसर मिला.युवाओं में लिव इन का क्रेज है. वे विवाह की जिम्मेदारियों में बंधना नहीं चाहते.सामाजिक सुरक्षा के चलते अविवाहित मातृत्व यहां बोझ नहीं है.स्वतन्त्र जीवन की चाह में युवा आजीवन माता पिता के साथ भी नहीं रहते. इसलिए ज्यादातर बुजुर्ग एकाकीपन के शिकार हैं. कुत्ते उनके सच्चे वफादार मित्र हैं.कई बार तो मर खप जाने की सूचना के वाहक कुत्ते ही होते हैं. इसीलिए उनकी देखभाल सन्तान से ज्यादा होती है.
पोती सुकृति के स्कूल में जाकर देखा कि हमारे अपर्याप्त मिड डे मील की तुलना में यहाँ छोटे बच्चों के सम्पूर्ण पोषण का कितना ध्यान रखा जाता है. बालिग होने तक खेल कूद से लेकर खान-पान और आराम तक बिना किसी व्यय के उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की पूरी जिम्मेदारी सरकार की है. एक भी बच्चा कुपोषित दिखाई नहीं देता.मांसाहार से यहाँ कोई परहेज नहीं है.यहाँ जैसे उनके भावी जीवन की ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें अनुशासन में बाहर घुमाने फिराने और फिल्म दिखाने के लिए भी ले जाया जाता है.समर पार्टी में सारे बच्चों को टेटू बनवाने की आजादी है.कोई भी उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकता.शिकायत पर माता पिता के विरुद्ध भी पुलिस कार्रवाई हो सकती है.पब्लिक लाइब्रेरी से एक माह के लिए वे मनचाही पुस्तकें और डिजिटल गेम इश्यू करा सकते हैं.बिना छुट्टी के उन्हें बाहर नहीं ले जा सकते. सरकार अभिभावकों को ढाई सौ यूरो प्रति बच्चा घर पर ठीक से देखभाल के लिए अलग से देती है. नौकरीपेशा दंपति को बच्चों को स्कूल ले जाने, लाने हेतु समय की छूट. इसीलिए तमाम रिफ्यूजियों का पसंदीदा देश जर्मनी है जहां सर्वाधिक सामाजिक सुरक्षा की गारंटी है.हर माह उन्हें सपरिवार जीवन निर्वाह की राशि मिल जाती है.उसके दुरुपयोग की स्थिति में अब सरकार उन्हें कूपन देने की तैयारी में है जिनका उपयोग केवल जर्मनी में ही करना होगा.
सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिहाज से जर्मनी माडल है.प्रदूषण रहित इलेक्ट्रिक बसें,ट्राम, ट्रेन और सबसे ज्यादा साइकिलें पूरे बर्लिन को जोडती हैं.एक पास सारे वाहनों में मान्य है.सब कुछ डिजिटल. सारे मार्गों और उन्हें जोडने वाले वाहनों की जानकारी आन लाइन . एप पर उपलब्ध साइकिल और स्कूटर हर जगह मौजूद हैं जरूरत के अनुसार उन्हें इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत में ज्यादातर गायब हो जाते.रेल और बस में साथ ले जाने पर उनका भी टिकट लगता है. टिकट चेकिंग कभी-कभार होती है. बिना टिकट पकडे जाने पर साठ यूरो का जुर्माना देना पडता है .जेब में न होने पर आपके घर नोटिस आ जाता है जिसे आप आन लाइन दे सकते हैं.सडकों पर साइकिलों की अलग लेन उनके सवारों को सुरक्षित करती हैं. दुधमुंहे बच्चों को सुविधाजनक सुरक्षित तरीके से साइकिलों के आगे पीछे बिठाकर तेजी से दौडते माता पिताओं को देखना आश्चर्य से कम नहीं .बच्चों का कहीं कोई टिकट नहीं.मुक्त. बुजुर्गों और विकलांगों को हर जगह विशेष सुविधा.बस के ड्राइवर विकलांगों की ट्राई साइकिल को चढ़ाते हैं ,उतारते हैं.वही कंडक्टर की भूमिका भी निभाते हैं.पैदल यात्रीगण का विशेष ध्यान. तमाम व्यस्त मार्गों पर संकेत चिन्ह जिससे उन्हें सुरक्षित रूप से सडक पार करने में सुविधा हो.भारत में तो अधिकांश मौतें सडक पार करने में ही होती हैं.हिट एंड रन अक्सर होते रहते हैं. इसी अराजकता के कारण भारत में दुर्घटनाओं का आंकडा विश्व में सबसे ऊपर है .परिवहन की सम्पूर्ण सुरक्षा के बिना विश्व की तीसरी अर्थ व्यवस्था की चर्चा ही बेमानी है.इसीलिए योरप में ड्राइविंग लाइसेंस मिलना बेहद कठिन है जबकि भारत में नाबालिग तक बिना लाइसेंस के धडल्ले से वाहन दौडाते हैं और लोगों को कुचलते हुए कानून की धज्जियाँ उडाते हैं.इस अपराध में उनके अभिभावक भी सहभागी हैं.विजय दान देथा की कहानी अलेखूं हिटलर इस माहौल को सटीक तरीके से अभिव्यक्त करती है.
मानव विकास सूचकांक में जीवन की गुणवत्ता के जिन मानकों पर विचार किया जाता है जर्मनी उन पर एकदम खरा उतरता है.स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से पूरी व्यवस्था चाक चौबंद है.डाक्टर अनावश्यक दवा देने से मरीजों को बचाते हैं और उनकी इम्यूनिटी बढाने की सलाह देते हैं जबकि बुजुर्ग मरीजों के एक फोन पर इमर्जेंसी वैन तत्काल हाजिर हो जाती हैं.साफ सफाई की आदर्श व्यवस्था है. प्लास्टिक का दूर दूर तक कोई नामोनिशान तक नहीं. जगह-जगह कूड़ेदान हैं जिनमें गीला और सूखा कूडा डालने की व्यवस्था है.दिन में दो बार गाडी आती हैं जो कूड़ा ले जाती हैं.ड्रेस में मुस्तैद कर्मचारी कचरे के डिब्बों को ऑटोमेटिक मशीन पर रखते जाते हैं.कागजों को डालने के अलग डिब्बे होते हैं.इसी तरह कुत्तों को पालने वाले उनकी पाटी नैपकिन से अलग डिब्बों में डालते हैं.कहीं कोई गन्दगी दिखाई नहीं देती.कुत्तों को पालने के नियम भी बेहद सख्त हैं.चिडियों और पंछियों के अलावा कहीं कोई आवारा जानवर नहीं दिखाई देता.मजदूरों पर काम का अनावश्यक दबाव नहीं. ज्यादातर काम मशीनों से.उनकी दैनिक जरूरतों का पूरा इंतज़ाम. आत्मानुशासित समाज.
बर्लिन में बस अराजकता सिर्फ सिगरेट और बीयर की बोतलों को जहां तहां फेंकने में दिखाई देती है. ज्यादातर स्त्री पुरुष चेन स्मोकर हैं बल्कि स्त्रियां पुरुषों से आगे ही हैं.यह पूर्व और पश्चिम जर्मन संस्कृति का भी फर्क हो सकता है.इसके लिए क्या हिटलर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? शाम होते ही तमाम होटल और रेस्टोरेंट गुलजार हो जाते हैं. स्त्री पुरुष मित्रों ,परिवारों के साथ लोग खूब खाते पीते ऐश करते हैं.पानी की तरह बीयर पीते हैं.बीयर गार्डन की संस्कृति यहाँ की खासियत है. इस मायने में बर्लिन सचमुच अन्तरराष्ट्रीय राजधानी है भले यहाँ से सीधी फ्लाइट कम हैं.हर देश का खान-पान यहाँ उपलब्ध है.नदी किनारे बैठकर लोग गीत-संगीत का आनंद लेते हैं.नौका विहार के मजे लेते हैं.जबकि ज्यादातर भारतीय यूरो और रुपए का ही हिसाब किताब करते रह जाते हैं. कुछ सर्वहारा और समाजसेवक खाली बोतलों को सुबह-सुबह उठाकर सुपर मार्केट में जमा करके पीने का जुगाड कर लेते हैं. इनको कूपन देने की प्रक्रिया से इस अराजकता पर थोडी लगाम लगी है. धूम्रपान पर नियंत्रण के लिए यहाँ रूस जैसी व्यवस्था करने की जरूरत है जहां इस कार्य हेतु स्थान निश्चित हैं.
खेल कूद जर्मन जीवन का अनिवार्य अंग है. ओलंपिक खेलों में दसवां स्थान प्राप्त करना कोई मामूली बात नहीं है. बचपन से ही फुटबाल, दौड, साइकिल, तैराकी के लिए बच्चों को घर बाहर प्रोत्साहित किया जाता है.फुटबाल तो यहाँ का जुनून है.इसका अनुभव हमें यूरो कप के दौरान हुआ . जर्मन टीम के मैच के दिन तो जोश आसमान तक रहता था.सब जगह बड़े बडे टीवी सेटों पर लाइव मैच दिखाने की व्यवस्था. बीयर का जोश, गोल होते ही पटाखों का शोर. हारते ही सन्नाटा.सारे मैदान, तरणताल शनिवार और रविवार को गतिविधियों से भरे रहते हैं.लोग बाहर जाकर एन्जॉय करते हैं.ट्राईथलोन प्रतियोगितात्मक कार्यक्रम चलते रहते हैं.अक्सर पार्कों में सन बाथ लेते लोगों को देखा जा सकता है.इसीलिए यहाँ के ज्यादातर लोग फिजीकली फिट रहते हैं.वे जीवन की सारी गतिविधियों को उत्सव की तरह उल्लासपूर्ण तरीके से एन्जॉय करते हैं.बडे बडे पार्क टिकट प्रवेश देते हैं जहां आप पार्टियाँ आयोजित कर सकते हैं.अपरिचितों को भी हाय हलो करना यहाँ की आदत है.
जहाँ तक मौसम का मामला है तो हम भारत की बेहद गर्मी से निकलकर बर्लिन गये थे.वहाँ पहुँचते ही बारिश ने हमारा स्वागत किया.यहाँ तक कि न्यूनतम तापमान छह डिग्री तक हो गया.यह हमारे लिए आदर्श मौसम था.सुबह तो एक गर्म कपड़ा तक पहनना पडता था.दिन में थोड़ा सा तापमान बढते ही बारिश हो जाती थी.कहीं कोई जलभराव नहीं.मौसम विभाग भी भारत की तरह धोखेबाज नहीं.लोग मौसम की जानकारी से अपने कार्यक्रम तय करते हैं और वह एकदम सटीक होती है.ज्यादातर लोग छतरी साथ ही रखते हैं.रातें छोटी होती हैं.भारतीय समय के अनुसार हम शाम को नौ बजे सो जाते थे क्योंकि सुबह चार बजे जगना होता था जबकि वहाँ दस बजे तक धूप और उजाला रहता था.
विश्व के सर्वश्रेष्ठ यूनेस्को से प्रमाणित संग्रहालय बर्लिन और पौट्सडेम में मौजूद हैं जिनमें जर्मनी सहित यूरोप और आसपास के देशों का पूरा इतिहास, पुरातत्व, युद्ध कौशल, संस्कृति ,साहित्य और कला सुव्यवस्थित और जीवंत रूप में उपस्थित है. पर्यटक और स्थानीय लोग टिकट लेकर उस अतीत से गुजरते हैं.इसी आय से उनका मेन्टेनेन्स होता है.हम्बोल्ट विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक धरोहर और मानव सभ्यता का उनका उत्खनन किसे आकर्षित नहीं करता. डायनासोर तो उस संग्रहालय के मुख्य आकर्षण हैं.तमाम गलियों, चौराहों के नाम महान लोगों की याद दिलाते हैं.बर्लिन की दीवार जर्मनी के साम्राज्यवादी अतीत की याद दिलाती है जिसे कलाकारों ने आकर्षक बना दिया है. जर्मनी के इतिहास में हिटलर के अत्याचार कभी भुलाए नहीं जा सकते. यहूदी संग्रहालय उनका प्रत्यक्ष प्रमाण है. हिटलर की गैलरी से उसके आद्योपांत जीवन वृत्त और आत्मघात तक की कथा को जाना जा सकता है.इसीलिए जर्मन जनता अब उसका नाम भी नहीं लेना चाहती.फ्रेडरिक द ग्रेट के देश में उनका नाम सबसे ज्यादा पसंदीदा नाम है और हिटलर सबसे घृणित लेकिन इतिहास को कौन नकार सकता है?यह खलनायक उस जैसे कुछ लोगों का आज भी नायक है .इतिहास की इससे बडी विडम्बना और क्या हो सकती है?--------------
# शक्तिनगर, चन्दौसी,संभल 244412
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