तथाकथित व्यंयकारों को सादर सप्रेम
नख दंत विहीन सरकारी और असरकारी व्यंग्य
जब से सत्ता की चाल ,चरित्र और चेहरे मोहरे में बदलाव हुआ है व्यंग्य की जमीन बंजर हो गयी है ।पता नहीं कब किस बात पर व्यंग्यकार और कार्टूनिस्ट को नक्सली बताकर उसकी सरकारी हत्या कर दी जाये ।अच्छा हुआ परसाईजी टाँग तुड़वाने का मामूली प्रसाद लेकर समय से इस दुनिया से दफा हो गये अन्यथा ....जेल जाने से तथाकथित लेखक और बुद्धिजीवी वैसे भी नहीं डरता क्योंकि उसके बाद बाजार में उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है ,सत्ता के बदलने से तो पदम् सम्भावना भी ।अमूमन हास्य व्यंग्य साथ साथ चलते हैं इसलिए उनके बीच का फर्क नजरअंदाज किया जाता है ।कविसम्मेलन तो अब हास्य व्यंग्य के ही पर्याय हो गये हैं जबकि दोनों के बीच बड़ा फर्क है ।हास्य जहाँ अपने हर रूप में गुदगुदाता है वहाँ व्यंग्य नश्तर चलाता है ,कई बार ख़ंजर भी ।कई बार व्यंग्य जब कटु उपहास और कटाक्ष का रूप ले लेता है तो उसके परिणाम भयंकर होते हैं ।इसीलिए व्यंग्य को केवल नकारात्मक न होकर सकारात्मक और सुधारात्मक होना चाहिए । हल्के फुल्के हास्य को लोग हँसकर झेल जाते हैं जबकि व्यंग्य को दुर्योधन की तरह दिल पर ले लेते हैं और मौका मिलते ही बदले की फ़िराक में रहते हैं।कितना ही लोग ऊपरी मन से निंदक को नियरे रखने की उदारता दिखाएं लेकिन आलोचक की तरह व्यंग्यकार भी अझेल है।उसे हर जगह गालियां ही मिलती हैं ।यही उसका दुर्भाग्य है ।
जिन महापुरुषों ने साहित्य को सत्ता का स्थायी विपक्ष बताया था उन्हीं को बाकी कलाएँ गोल मोल नजर आती थीं, जिनकी न कोई प्रतिबद्धता थी ,न जोखिम।हर समय राग दरबारी।नख दंत विहीन कला की तुलना शालिग्राम से होती थी जिसमें कोई काँटा ही नहीं होता ।एकदम आशुतोष।उनकी स्प्रिंगदार जीभ इतनी घुमावदार थी कि उसमें अनेकान्तवाद की अपार संभावनाएं थीं ।वे ब्रह्म की तरह सर्वकालिक, होने के साथ ही कालातीत कला के पुरोधा थे ।वे साक्षात विरुद्धों के सामंजस्य थे ।उनके इशारों पर कलाओं के भूगोल खगोल बदलते थे ।प्रकाशकों की बत्ती जलती बुझती थी ।
व्यंग्य तो वैसे भी क्षत्रिय विधा है जो दीन हीन हो ही नहीं सकती ।व्यापारियों ने इसे भी सरकार की चापलूसी में लगा दिया है ।पता ही नहीं चलता कि व्यंग्यकार जूते चाट रहा है या जूते मार रहा है ।सत्ता जब ऐसी कटु सत्यवाचक विधा को भी अपनी जरखरीद दासी बना ले तो फिर कहने को बचता ही क्या है ? एक वक्त था जब सत्ताधीश कार्टूनों के आप्तवाक्यों के पीछे जनमत के कूटार्थ बाँचते थे ।अब तो वे दम ही तोड़ चुके हैं ।
सरकारी ठप्पा लगते ही लेखक की हर रचना विज्ञापन और क्रांति विरोधी हो जाती है।तब क्या रचना के लिये जेल जाये बिना क्रांति सम्भव ही नहीं ?पुरस्कार वापसी गैंग इसीलिए अब प्रतिक्रान्तिकारी होने का लाभ नहीं उठा सकता ।यानी राष्ट्रवादी होने की सारी सम्भावनाएं हमेशा के लिये समाप्त।अब सरकार बदलने पर ही शहर की सम्भावना सम्भव है ।गाँव का जीवन यों भी कष्टकारी है ।अतीत में चिरगांव से राज्यसभा जाना सम्भव था लेकिन अब वहाँ सिर्फ मनरेगा की मजदूरी मिल सकती है ।उसमें भी पत्ती तय है ।
जब से मीडिया में सम्पादक की जगह मालिक ने जबरिया छीन ली है तब से वह सरकारोन्मुख हो चुका है ।मालिक का शुभ लाभ सरकार से ही सधता है तो उसके विरुद्ध कौन मतिमन्द जाना चाहेगा? अब हर जगह सम्पादक नाम का एक रीढ़हीन जीव दिखावे के लिये रख लिया जाता है जो मालिक की इच्छा के अनुसार कठपुतली की तरह नाचता रहता है ।थोड़ी सी आजादी उसे मालिक दे देता है ताकि उसे जीवित होने का अहसास बचा रहे ।वह इतना आत्मानुशासित हो जाता है कि सत्ता विरोधी लोकतांत्रिक आलोचना और रचना को विमर्श से बाहर रखने में ही पूरी ताकत लगा देता है ।यही ऑटो दिमागी कंडीशनिंग बाकी व्यक्तित्वहीन पुतलियों की हो जाती है जो उसको सन्तुष्ट रखती हैं।कहीं से कोई संकट या आपत्ति आती है तो सबसे पहले इसी निरीह प्राणी की बलि चढ़ाई जाती है ।अपवादस्वरूप किसी के कुछ कील कांटे बचे हैं तो उन्हें सीबीआई और आईडी के छापों ने झाड़ दिया है और वह चुपचाप मुख्यधारा में घिस और घुस चुका है ।जिंदा रहने की शर्त ही जब सरकारी विज्ञापन हो तो विकल्प भी क्या हो सकता है ।यानी राजनीति की तरह विकल्पहीनता का संकट यहाँ भी है ।ऐसे में न असरकारी पत्रकारिता की गुंजाइश है ,न साहित्य की ।सब कुछ तात्कालिक उत्पादन में बदल चुका है आदतन कि इसके सिवा कुछ कर नहीं सकते।
अब सबसे बड़ा संकट उन पत्रकारों ,रचनाकारों के सामने है जो अपने औज़ारों से क्रांतिकारी काम लेना चाहते हैं।उन्हें कोई मीडिया समूह झेलने को तैयार नहीं।पार्टियों की अपनी शर्तें हैं।सब कुछ ऐसे छद्म में तब्दील हो चुका है जहाँ कोई पहचान ही नहीं बची है ।कुल मिलाकर यह विचार और विचारधारा की निराशा का दौर है ।ईश्वर के साथ इतिहास की मौत काफी पहले हो चुकी है ।ऐसी उच्च नैतिकता में केवल शुध्द धंधा सम्भव है और कोई रास्ता नजर नहीं आता ।जो यह नहीं कर सकते वे मरने के लिये आजाद हैं।
प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के बाद की खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है ।मोबाइल के डिजिटल कैमरे के वीडियो ने प्रत्यक्ष साक्षी की भूमिका अदा की है ।उसके आधार पर कार्रवाई हो रही है और निर्णय भी दिये जा रहे हैं।दुष्कर दुनिया अब इतनी नजदीक हो चुकी है कि वाकई वह मुट्ठी में है ।अफवाहों और फेकन्यूज ने मीडिया का एक नया ही रूप खोल दिया है।साइबर क्राइम ने पारम्पिक अपराध को पीछे छोड़ दिया है ।अब तकनीक में पिछड़ा हुआ ही सही मायने में पिछड़ा है ।
साहित्य की दुनिया में साहित्यकारों की छवि का कोई ठिकाना नहीं ।उनके मूल्यांकन के लचीले अवसरवादी मूल्य कब बदल जाएंगे कोई ठिकाना नहीं ।एवरेस्ट पर बैठी महानता कब भूलुंठित हो जायेगी कह नहीं सकते।उसे गिराने उठाने में सम्पूर्ण पुरुषार्थ की इतिश्री हो रही है ।
साहित्य के राष्ट्रवादी उभार में आये बदलाव में यह देखा जा सकता है कि कैसे पुराने दौर में कीड़े मकोडों में शुमार लेखकों पर लक्ष्मी बरसने लगी है ।उनके अभिनंदन ,वंदन और चंदन की चर्चा चहुं ओर है ,जबकि पुराने प्रतिष्ठित महामानवों पर मक्खियाँ भी नहीं भिनक रहीं ।हां ,अचूक अवसरवादियों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।
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