Wednesday, October 16, 2024

युद्ध और शांति की धरती से क्रान्तिकारी विश्व मानवतावाद का उद्घोष



# मूलचन्द्र गौतम
अभी तक विश्व मानवतावाद बौद्धिकों के बीच चर्चा का जीवंत मुद्दा है तो इसके पीछे जरूर ही कोई गम्भीर कारण होना चाहिए . जब सारी दुनिया को ग्लोबल विलेज में बदलने के प्रयास निरंतर जारी हों और दया ,करुणा ,मानवीयता की पुकार हर तरफ से उठ रही हो तब उसके लिए खतरा कहाँ से और किधर से है यह देखने और सोचने की गम्भीर बात है .विश्व के तमाम धर्मध्वजी , धर्म धुरंधर,संत ,महात्मा ,योगी यती ,मौलाना और पादरी रात दिन जोर शोर से चिल्ला चिल्लाकर मानवता की सुरक्षा में संलग्न हों तो खतरा क्यों और क्या है ?
सभ्यता के आरम्भ से ही मानव हिंसा और युद्धों में संलग्न रहा है .आज भी हटिंगटन का सभ्यता संघर्ष का सिद्धांत यही सिद्ध करता है कि केवल आदिम समाज का आधुनिकीकरण भर हुआ है ,प्रवृत्तियां जस की तस हैं .सभ्यता शब्द की चाशनी में धर्म और नस्ल के खूनी पंजे छिपे हुए हैं .दो -दो विश्वयुद्ध झेल चुकी धरती फिर तनावग्रस्त है .हथियारों की होड़ , परमाणु युद्ध  और व्यापार युद्ध में एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने की धमकियां आये दिन की बातें हैं .विश्व का आधुनिकतम देश आंतरिक हिंसा का शिकार है .विद्यालयों में होने वाली गोलीबारी आम घटना है जिसे रोकने के कोई नैतिक और कारगर प्रयत्न नहीं किये जा रहे हैं .9/11 को लेकर नोम चोमस्की की चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा .ऐसे अमानवीय विकास को लेकर कोई क्या करेगा जब कुछ बचेगा ही नहीं .देशों और नेताओं का नाम लिए बिना भी समस्या से सब वाकिफ हैं .
ऐसे माहौल में उम्मीद फिर अतीत के उन नायकों के विचार और प्रयत्नों की ओर जाती है जिन्होंने अहिंसा से विश्व को बदलने में योगदान किया है .वर्तमान विश्व में  इस दिशा में एकमात्र गांधीजी की तरफ ही ध्यान क्यों जाता है यह विचारणीय है .गांधीजी की मानस निर्मिति में विश्व के तमाम महान विचारकों और पंथों की परम्परा समाहित थी .टॉलस्टॉय और रस्किन उनके मुख्य प्रेरक थे .टॉलस्टॉय से उनका विचार विमर्श और पत्राचार अक्सर होता रहता था .हिन्द स्वराज पर उनके विचारों की स्पष्ट छाप थी .टॉलस्टॉय के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास वार एंड पीस और अन्ना करेनिना के साथ उनकी वैचारिक कृतियों का प्रभाव उन पर गहरा था ..व्हाट इज आर्ट ,द स्लेवरी ऑफ़ आवर टाइम्स ,द फर्स्ट स्टेप ,हाउ शैल वी इस्केप ,द किंगडम ऑफ़ गॉड इज विदिन यू का आध्यात्मिक विमर्श गांधीजी को यों ही प्रिय नहीं था .इसी तरह रस्किन की ए ज्वाय फॉर एवर और अन टू दिस लास्ट का व्यवहार गाँधी का आदर्श था .मानवता का औदात्य उन्हें इस चिन्तन में दिखता था .टॉलस्टॉय की ए लेटर टू हिन्दू पुस्तक से तो गाँधी इतने ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने 1909 की ऐतिहासिक समुद्री यात्रा के दौरान ही 413 पृष्ठ की इसकी पांडुलिपि का गुजराती अनुवाद कर दिया था .इस पुस्तक का सार था कि हिन्दुओं को इंग्लैण्ड की सत्ता का प्रतिरोध हिंसा से नहीं बल्कि अहिंसा से करना चाहिए .यही कार्य गांधीजी ने अडिग रहकर जीवन भर किया .यह अजीब संयोग रहा कि टॉलस्टॉय ने अपने जीवन की अंतिम किताब जोसेफ डोके की लिखी गांधीजी की जीवनी पढ़ी थी और अपना अंतिम विस्तृत पत्र जो लिखा वह गांधीजी को ही संबोधित था .मानवता के ये दस्तावेज  आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं .
युद्ध से पीड़ित विश्व में संघर्ष कम करने वाली शक्तियाँ अब कम होती जा रही हैं .शांति , आपसी प्रेम और भाईचारे की जगह संकीर्ण स्वार्थों ने ले ली है जहाँ लक्ष्य को हासिल करने के लिए सब कुछ जायज है .इसी संकीर्णता ने गांधीजी और उनके मार्टिन लूथर किंग जैसे अनुयायियों की हत्या करने में कोई संकोच नहीं किया .गांधीजी ने जितने साहित्यकारों ,संस्कृतिकर्मियों को प्रभावित किया वह एक दुर्लभ उदाहरण है .उनका धर्म और हिंदुत्व संकीर्ण न होकर समावेशी था . समाज के आखिरी आदमी की चिंता ने उन्हें हिन्दू समाज में व्याप्त छुआछूत से परेशान किया था .वे साम्प्रदायिक सद्भाव और दलितों के उद्धार के लिए अंत तक प्रयत्नशील रहे .उनका मानवतावाद अमूर्त नहीं था .
विश्व के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में  कारपोरेट अमीरों का व्यापारिक भूमंडलीकरण है जो विश्व की ज्यादा से ज्यादा पूँजी को  येन केन प्रकारेण अपने कब्जे में कर लेना चाहता है और हर देश की सत्ता और जनता को अपना स्थायी उपनिवेश बनाकर रखना चाहता है .  फर्क सिर्फ यह है कि नवउपनिवेशवाद पारम्परिक न होकर बारीक और  अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस है . आर्थिक संसाधनों के साथ संस्कृति ,साहित्य और कला भी उसके प्रभावी औजार और  माध्यम हैं . कारपोरेट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी के नाम पर गरीबों को नाममात्र की भीख देकर ये भारी मुनाफाखोर अपना मानवीय चेहरा जनता में पेश करके उसे धोखा देते हैं .विश्व की हाशियों में सिमटी गरीब आबादी एकजुट न होकर जाति ,सम्प्रदाय और छोटे छोटे गुटों –गिरोहों में बंटी हुई है .विश्व आतंकवाद के निशाने पर भी यही आबादी है जिसे आये दिन भेड़ –बकरियों की तरह कहीं भी जिबह कर दिया जाता है .  इस दूसरे स्तर के भूमंडलीकरण में सर्वहारा की तानाशाही की विकृतियों से मुक्ति और खुले जनतंत्र की अपार संभावनाएं निहित होंगी .क्या इन विश्व्यापी विसंगतियों का समाधान हमें अतीत के साहित्य और संस्कृति में मिल सकता है .मानव आत्मा के ये कुशल अभियंता हमें सच्चे मानवतावाद की ओर ले जा सकते हैं ?एक नई विश्व सरकार अस्तित्व में आ सकती है जहाँ सबको मनचाहा सब कुछ उपलब्ध हो .
टॉलस्टॉय के बाद गोर्की ने विश्व मानवतावाद को एक नई दिशा दी . जब टॉलस्टॉय ईसाई मत के पूर्ण नकारवाद के शिकार बना दिए गये थे .उन्हें पुरातनपंथी गिरजे का कोपभाजन बनकर धर्मच्युत होना पड़ा .रूसी साम्राज्य के हर प्रार्थना घर में उनके खिलाफ घिनौने फतवे पढ़े जाने लगे .तब लेनिन के नेतृत्व में गोर्की ने मार्क्स और एंगेल्स के आदर्शों को व्यवहार से जोड़ा .दुनिया के हर कोने में ऐसे लोग आज भी मौजूद हैं जिनकी राजनीतिक समझ गोर्की के उपन्यास –माँ और उनकी संघर्षशील आत्मकथा से विकसित हुई है .विश्व के तमाम लेखकों को संघबद्ध होकर अन्याय और संघर्ष की प्रेरणा उनसे मिलती है . 1934 में सोवियत संघ की पहली कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए गोर्की ने कहा था –न्यायाधीश की हैसियत से हम फैसला देते हैं इस दुनिया के बारे में जिसे नष्ट होना ही होना है और मानव की हैसियत से हम ऊँचा उठाते हैं असली मानवता को ,क्रान्तिकारी मजदूर वर्ग की मानवता को ,उन लोगों की मानवता को जिन्हें इतिहास ने समूची दुनिया को उन सबसे मुक्त करने के लिए आमंत्रित किया है ,जो ईर्ष्या ,धनलिप्सा तथा उन सब बुराईयों में फंसे हैं जो सदियों से अपने श्रम पर जीने वाले लोगों को विकृत करती आ रही है .---हम शत्रु हैं सम्पत्ति के –जो कि पूंजीवादी दुनिया की नीच और भयानक अधिष्ठात्री है .हम शत्रु हैं –समूचे पाशविक व्यक्तिवाद के ,जो कि उसका घोषित धर्म है .यही आवाज भारत में 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम सम्मेलन में प्रेमचंद की थी .क्या यह महज संयोग था ? 1932 में गोर्की पूछ रहे थे ‘संस्कृति के निर्माताओ” तुम किसके साथ हो जिसे मुक्तिबोध ने भी पूछा –पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ? वर्तमान में स्टीफन हाकिंग की चिंता इसी कड़ी में है .विज्ञान आज धर्म से बड़ा सत्य है जो नवमानवतावाद का आधारभूत ढांचा और सांचा तैयार करेगा .
विश्व में  मार्क्स के ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने धर्म को अफीम बताकर उसके दुर्गुणों और दुष्प्रभावों की ओर संकेत किया था जिसे धर्मविरोधी जुमले में बदल दिया गया जबकि इतिहास धर्म की प्रगतिशील भूमिका को स्वीकार करके उसके नकारात्मक असर से मानवता को आगाह करता है .चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने  माओ से अलग आधिकारिक रूप से धर्म की सत्ता को स्वीकार करके एक क्रान्तिकारी संशोधन किया है ताकि धर्मविरोधी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सोवियत संघ की तरह उसके आंतरिक विघटन में कामयाब न हो सकें .  यह थ्येनमन चौक की घटना का सबक समझा जाना चाहिए .भविष्य में हो सकता है कि दलाई लामा  किसी सम्मानजनक समझौते के तहत चीन लौट जाएँ .यह विश्व राजनीति और मानवतावाद के लिए एक महान घटना होगी जो असम्भव तो कतई नहीं है .ग्लोबल विलेज जब राष्ट्रों की नकली औपचारिक सीमाओं को मान्यता नहीं देता तो देर सबेर मानवता का एक नया यूटोपिया सम्भव हो सकता है .यों भी नई कूटनीति में  किसी देश के  अंधसमर्थन और अंधविरोध के अतिवाद के कोई मायने नहीं हैं .
गोर्की निश्चित रूप से  अमूर्त धार्मिक बुर्जुआ मानवतावाद से खुद को अलग करके चल रहे थे क्योंकि यह नकली , झूठ और धोखे से भरी दुनिया है . उनका लक्ष्य विश्व भर के सर्वहारा को क्रान्तिकारी मानवतावाद की ओर प्रेरित करना था जो  मध्यवर्गीय फिलिस्टाइन विघटित व्यक्तित्व से ग्रस्त लेखकों को दिग्भ्रमित कर रहा था . इतिहास के अंत ,दुनिया के पागल हो जाने की घोषणाएं जितने जोर शोर से की जा रही हैं वह चितित करता है .तानाशाह विश्व राजनीति में नई सज धज के साथ आ रहे हैं जो किसी ब्रेख्त से रुकने वाले नहीं हैं .मीडिया और संचार ने सत्ता ,अर्थव्यवस्था का एक नया संजाल खड़ा कर दिया है जहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक छोटी मछलियों को निगल जाने को अति आतुर हैं .धर्म उनकी मजबूत ढाल बनकर खड़ा है .धर्म के प्रतीक आदमी की बुनियादी जरूरतों से ज्यादा हो गये हैं . ईश्वर और सम्प्रदाय की आड़ में जनता की कन्डीशनिंग की जा रही है .क्रिश्चियनिटी से चर्चियनिटी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है .श्रमिक वर्ग की सामूहिक क्रान्तिकारी चेतना को विस्फोट से रोकने का यह कारगर और अचूक उपाय है .गोर्की ने गहन वैचारिक विश्लेषण के द्वारा इसे काफी पहले महसूस कर लिया था .
आज विश्व को सबसे बड़ा खतरा सत्ता की आतंकवादी ,वर्चस्ववादी हिंसक राजनीति और प्रतिगामी धर्म से है जिसकी नाव पर सवार होकर फासिज्म विश्वभर में अपने पैर पसार रहा है .  बदलाव की इस अनिवार्य प्रक्रिया में विश्वभर में दक्षिणपंथी राजनीति के उभार ने शक्ति संतुलन को बदल दिया है .महाशक्तियां एक दूसरे को अपने साम्राज्य में घुसने न देने पर आमादा हैं .रणनीति और कूटनीति के नये से नये मोहरे और खेल ईजाद किये जा रहे हैं .सोवियत संघ के विघटन ने विश्व की एक बड़ी आबादी से आजादी का बड़ा सपना छीन लिया है .इस दुर्घटना से  विश्व में  एक नई व्यावहारिक राजनीति ने जन्म लिया है जो निरंतर चौकन्ने रहने को बाध्य करती है . अब किसी देश के पास  ऐतिहासिक महान वैचारिक नेतृत्व नहीं है .बड़े से बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष  तमाम ताम झाम के बावजूद किसी कम्पनी के सीईओ या सनकी,मूर्ख तानाशाह और जोकर से ज्यादा नहीं लगते. एक तनी हुई रस्सी पर चलने का कौशल ,बाजीगरी हो गयी है- विश्व  राजनीति जहाँ पलक झपकते सिनेरियो बदल जाता है .यह एक नये तरह का शीतयुद्ध है . जिसमें केवल वाग्जाल के सहारे जनता को देर और दूर तक बहलाया –फुसलाया नहीं जा सकता . भले नये से नये थिंक टैंक पल पल चालें तय कर रहे हैं .जरा सा कोई भंडाफोड़  सत्ता की बाजी को  मात में बदल सकता है .चुनावों में जनमत को  किसी खास दिशा में प्रभावित कर सकता है फिर आरोप प्रत्यारोप कोई किसी पर लगाता रहे .
ऐसे में जब टेररिज्म से लेकर देह के अंग प्रत्यंग तक व्यापार की जद में हैं तो किसी उदात्त ,मानवीय व्यवस्था की कल्पना करना कठिन है .आप या तो धारा के साथ हैं या उसके खिलाफ हैं .बीच की निरपेक्ष सुरक्षा आपको ज्यादा दिन उपलब्ध नहीं हो सकती .संस्कृति भी निरापद नहीं है .थिंक टैंक लगातार इस दिशा में कार्यरत हैं कि कैसे इस वर्चुअल सॉफ्ट पावर को वास्तविकता में बदला जाय .सोशल मीडिया  पर इन्टरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल ने जिस उत्तर सत्य को जनमानस के सामने खोल दिया है उसमें छिपाने को अब कुछ नहीं बचा है . जीवन और जगत की समस्याओं और विसंगतियों का हल कहीं बाहर से नहीं भीतर से ही आएगा .
जाहिर है विश्व मानवतावाद की तलाश के लिए मानव सभ्यता को एक नये नैमिषारण्य की जरूरत होगी जिसमें समस्त भाषाओँ के तमाम प्राचीन महान ऋषि ,मनीषियों .लेखकों के गहन चिन्तन -मनन के साथ आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिकों का सहकार होगा .सतयुग से लेकर रामराज्य ,वर्गविहीन समाज और अनेक यूटोपिया जिसमें साझा होंगे . जब भी हो कल्पना और वास्तविकता  के सहकार से ही यह सम्भव होगा क्योंकि कोरी कल्पना से कुछ नहीं होता .
{ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ,मास्को में पठित आलेख }
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ईमेल –moolchand.gautam@gmail.com


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