Monday, November 18, 2024

चिकने घडे पर मोबिल आयल की मालिश

 चिकने घडे पर मोबिल आयल की मालिश 

# मूलचंद्र गौतम 

सतयुग से त्रेता और द्वापर तक भारत  सोने की चिड़िया था और देश में दूध की नदियाँ बहती थीं. पुराने जमाने के लोगों को मालूम होगा कि तब घरों में दूध, दही और घी की हांडियों का क्या महत्व था.घर की लक्ष्मी उन्हें जान से भी ज्यादा संभाल कर रखती थीं .गलती से कभी-कभार टूट फूट जाने पर महीनों सालों पछतावे में रहती थीं जैसे घर-परिवार का ही कोई सदस्य बिछड गया हो.बडी बूढियों के पास उनका पूरा इतिहास भूगोल रहता था कि उनका आगमन घर में कब कब हुआ था.इसलिए उनकी सार संभाल का काम किसी लापरवाह नई नवेली अल्हड बहू को नहीं सौंपा जाता था.

कलियुग में जब से चाय, काफी और दारू का प्रचलन बढा है तब से दूध, दही और घी की हांडियां डायनासोर की तरह विलुप्त हो गयी हैं. भगवानों के प्रसाद तक में नकली घी का साधिकार प्रवेश हो चुका है.  छोटे छोटे बच्चों तक की  आंख बिना बैड टी के नहीं खुलती .चाय पानी,हुक्का पानी आतिथ्य की अनिवार्यता में शामिल हैं. अब पार्टी का मतलब ही दारू पार्टी है.मामूली से मामूली घरेलू फंक्शन बिना दारू की पूर्णाहुति के सम्पन्न नहीं माने जाते. काकटेल और माकटेल से ही आयोजक और आयोजन का स्टेटस तय होता है.जहां ये नहीं होते वहां मेहमान क्या मक्खी तक नहीं फटकती.

इस मामले में लोग एकदम चिकने घडे हो गये हैं बिन्दास  यहां कोई लाज लिहाज काम नहीं करता. अमीरजादों की रेव पार्टियों ने इस प्रथा को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया है .दूसरी तरफ नकल में शौकीन गरीब सस्ती दारू पीकर स्वर्गीय होने का अपार सुख भोग लेते हैं.पूर्ण शराब बंदी वाले राज्यों में यह दर कुछ ज्यादा ही है .

ये कलियुगी चिकने घडे परम बेशर्मी और बेहयाई के प्रतीक हैं. इनके लिए जेल ससुराल है. कत्ल करना शग़ल है. मुण्डों की माला पहनकर जब ये सजधजकर निकलते हैं तो  इनके वैभव को देखकर चक्रवर्ती सम्राट तक लजाता है. इस चिकनाई को बढाने के लिए ये किसी तेल फुलेल के बजाय मोबिल आयल की नियमित मालिश कराते हैं ताकि भलमनसाहत के पानी की एक बूंद तक इनके मखमली बदन पर टिक न सके.अगर टिक जाए तो ये रो रोकर दिल के घावों को दिखाकर उन्हें  जादू से वोट में  बदल लेते हैं. रंगदारी और तस्करी से उपजी इनकी लक्जरी लाइफ का माडल युवाओं को लुभाता है जो इनके कट्टर प्रचारक बन जाते हैं.अपराध की दुनिया में गैंगस्टर और शूटर बनना उनका एकमात्र लक्ष्य हो जाता है. थोड़े ही दिनों में फटाफट शार्टकट से मिली अमीरी में ये क्रिकेट, फिल्म और उद्योग जगत के सितारों को पीछे छोड़ देते हैं और फिर जल्द किसी के एनकाउंटर के शिकार हो जाते हैं. 

इन चिकने घडों के मुखमंडल से  आनुप्रासिक गालियों के फूल अनवरत झरते रहते हैं. गाल बजाने की  प्रतियोगिता में कोई इनसे जीत नहीं सकता. जनता इस  ग्लोबल क्रूरतापूर्ण युद्ध की इतनी आदी हो जाती है कि इस मनोरंजन के बिना उसे चैन नहीं पडता.निर्दोष लोगों की अकारण हत्या से उनकी पथराई संवेदना पर एक खरोंच तक नहीं आती.युद्ध कौशल के अभ्यास और विकास की यह कीमत आलू प्याज से भी  कम है .
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