व्यंग्य रचनाओं के आधार पर मेरी अपनी बात
# ए. असफल
यह संग्रह पढ़कर सच में हँसी भी आई, गुदगुदी भी हुई और कई जगहों पर मन में एक तीखी चुभन भी बनी रही।
मूलचन्द्र गौतम ने हिंदी के व्यंग्य को एक ऐसी चटपटी, देसी, बेधड़क और बेशर्म भाषा दी है जो आजकल बहुत कम देखने को मिलती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी पुराने चौपाल पर बैठे हुए कोई चतुर, शरारती, थोड़ा गुस्सैल और बहुत कुछ देख चुका बूढ़ा लगातार 6-8 घंटे बिना रुके बोलता रहे— और सुनने वाला बीच-बीच में हँसते-हँसते लोटपोट हो जाए, फिर अचानक चुप होकर सोचे कि “अरे यार… ये तो सच में बहुत कड़वा है”।
सबसे मजबूत पक्ष
भाषा की ताकत— देसी मुहावरे, किस्से, पुरानी कहावतें, तुलसी-कबीर-रहीम-बिहारी सबको बखूबी घोलकर एक नया शरबत बनाया है।
उदाहरण: “नीबू निचोड़ने की कला”, “पलटू राम की पलटन”, “पेट में दाढ़ी”, “राजा के सिर पर सींग”, “माया महाठगिनी हम जानी”— ये शीर्षक ही अपने आप में व्यंग्य का पूरा नमूना हैं।
राजनीति-समाज-धर्म-संस्कृति सब पर बराबर डटकर प्रहार— कोई भी पक्ष सुरक्षित नहीं बचा। न राम-कृष्ण के बीच युद्ध की कल्पना से बचे, न सोने की मुर्गी का पेट फाड़ने वाले वज्रमूर्ख से, न शनि-लक्ष्मी के वैर से, न पव्वे में तूफान से।
कालातीतता— ये व्यंग्य 2020-2025 के हैं लेकिन पढ़ने में लगता है मानो 80-90 के दशक से लेकर आज तक का पूरा राजनीतिक-समाजिक इतिहास एक साथ निचोड़ दिया गया हो।
कुछ चुनिंदा पसंदीदा अंश (मेरी निजी सूची)
नीबू निचोड़ने की कला→ राजनीति का सबसे सटीक और क्रूर सार।
“चुनाव से पहले सरकार पूंजीपतियों का नीबू निचोड़ती है, बाद में महंगाई बढ़ाकर पूंजीपतियों द्वारा जनता का नीबू निचोड़ा जाता है।”
पलटू राम की पलटन→ दल-बदल और अवसरवाद पर अब तक का सबसे मनोरंजक व्यंग्य।
“पलटू राम कोई व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है… आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का आविष्कार माना जा रहा है।”
पेट में दाढ़ी→ सबसे क्रूर और सबसे सच्चा।
“भारत को भविष्य में ऐसा नेता चाहिए जिसके चेहरे पर दाढ़ी हो न हो, पेट में जरूर हो।”
अगर सरकार बनी तो…→ चुनावी घोषणापत्रों और जुमलों पर बेहद करारा प्रहार।
“अगर सरकार बनी तो… के तहत होने वाली घोषणाएं उसके लिए बेमानी हैं।”
सोने की मुर्गी→ अंत में आकर सबसे शातिर पंच।
“अब घूस में न सोने का अंडा लेते हैं न उसका पेट फाड़ते हैं… वे सीधे सोने की मुर्गी लेते हैं और उसे लाकर में डाल देते हैं।”
कहाँ थोड़ा कमजोर पड़ता है?
कभी-कभी व्यंग्य इतना घना और संदर्भों से भरा होता है कि सामान्य पाठक के लिए “हँसी” से ज्यादा “समझने की कोशिश” में समय लग जाता है।
कुछ जगहों पर दोहराव और लंबाई लगती है ,खासकर बीच-बीच में पुराने किस्से बार-बार घुमाकर लाने से।
स्त्री-विमर्श वाले कुछ अंश आज के संवेदनशील समय में पुराने और असहज लग सकते हैं ,हालाँकि व्यंग्य का इरादा साफ है।
यह संग्रह सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर करारा प्रहार करने वाले व्यंग्यों का एक सशक्त दस्तावेज़ है। आपकी लेखनी में परसाई जैसी पैनापन और शरद जोशी जैसी सहजता का अनूठा मिश्रण दिखता है। ग्रामीण अंचल की शब्दावली (जैसे 'पल्लेदार', 'झख मारना', 'चिरकुट') और आधुनिक 'कॉर्पोरेट कल्चर' के बीच का सेतु इन लेखों को और भी दिलचस्प बनाता है।
यहाँ आपके द्वारा प्रस्तुत कुछेक और विभिन्न व्यंग्यों की संक्षिप्त समीक्षा और मुख्य बिंदु मेरे मतानुसार निम्नलिखित हैं:
ग्रामीण राजनीति और 'प्रधान पति' की त्रासदी
'प्रधान पति की दुर्गति' और 'राजनीति का खूंटा' जैसे लेखों में आपने ग्रामीण सत्ता के उस कड़वे सच को उजागर किया है जहाँ 'आरक्षण' केवल काग़ज़ों तक सीमित है।
मुख्य व्यंग्य: पत्नी के प्रधान बनने पर पति का 'मुंशी' या 'सामूहिक नौकर' बन जाना।
मार्मिकता: चुनाव जीतने के लिए मेहनत की गाढ़ी कमाई और दस बीघा ज़मीन के बराबर पैसा दारू-मिठाई में फूँक देना, और अंत में एक 'मैनेजर' के हाथों की कठपुतली बन जाना।
भ्रष्टाचार का 'मैनेजमेंट' और आधुनिक चार्वाक
'चार्वाक की संतानों से करबद्ध निवेदन' और 'जी फॉर घोटाला' में आपने 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' (कर्ज लेकर घी पीना) के दर्शन को आज के कॉर्पोरेट और बैंकिंग घोटालों से जोड़ा है।
तीखा प्रहार: बैंकों से मोटा कर्ज लेकर दिवालिया होना ही आज का 'कॉर्पोरेट कल्चर' है।
सत्य: "हथियारों की बिक्री में दलाली, हलाली से बड़ी होती है।" यह वाक्य रक्षा सौदों और भ्रष्टाचार के वैश्विक स्वरूप पर गहरी चोट करता है।
शिक्षा तंत्र और नकल माफिया
'नकल माफिया : अकल माफिया' और 'मूल्यांकन की फसल कटाई' में शिक्षा की वर्तमान दुर्दशा का कच्चा चिट्ठा है।
अवलोकन: डिग्रियाँ अब 'थोक' में बंट रही हैं और परीक्षक कॉपियों को "एक चावल से हांडी पहचानना" की तर्ज पर जाँच रहे हैं।
भाषा का द्वंद्व: 'डबल इंग्लिश' वाले लेख में आपने दिखाया है कि कैसे हिंदी का प्रोफेसर भी अब अपने घर में अंग्रेजी अखबार लगवा रहा है क्योंकि हिंदी अब केवल "प्राइमरी स्कूल की मास्टरनी" बनने तक सीमित रह गई है।
सांस्कृतिक ढोंग और 'गमछा माहात्म्य'
'अथ श्री गमछा माहात्म्य' और 'गुटका-पुराण' समकालीन प्रतीकों पर आधारित हैं।
प्रतीकवाद: गमछा, जो कभी गरीबी या ग्रामीणता का प्रतीक था, उसे कैसे सत्ता और 'कोरोना काल' ने एक नया 'ब्रांड' बना दिया।
सामाजिक बुराई: गुटका अब 'नशे की पुड़िया' नहीं बल्कि 'दिमाग चलाने' का ईंधन बन गया है, जो 'वेदांत' और 'ब्रांड' के बीच के अंतर को खत्म कर रहा है।
साहित्य जगत की गुटबाजी: 'दामादवाद'
आपका लेख 'साहित्य में दामादवाद' हिंदी जगत के आंतरिक विरोधाभासों और मठाधीशी पर सबसे कड़ा व्यंग्य है।
चोट: छायावाद और प्रगतिवाद के बाद अब केवल 'दामादवाद' बचा है, जहाँ योग्यता से अधिक संबंध मायने रखते हैं।
लेखन शैली की विशेषताएँ:
आप कृष्ण, राम, भीष्म और महाभारत के संदर्भों को जिस तरह 'बूथ कैप्चरिंग' या 'राजनीतिक अवसरवाद' से जोड़ते हैं, वह पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है।
भाषायी मुहावरे: 'पूत के पाँव पालने में दिखना', 'हमाम में नंगा होना', 'काठ की हांडी' जैसे मुहावरों का समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों में प्रयोग बहुत सटीक है।
साहस: लेखों में सीधे तौर पर सत्ता, जांच एजेंसियों और बौद्धिक वर्ग की विलासिता पर टिप्पणी की गई है।
आपकी ये रचनाएँ केवल हँसाती नहीं हैं, बल्कि आधुनिक भारत के उस 'कुरूप' चेहरे को दिखाती हैं जहाँ 'अकल' पर 'नकल' और 'ईमान' पर 'घोटाला' भारी है। 'प्रोफेसर अनुप्रास' से लेकर 'प्रधान पति' तक के चरित्र हमारे समाज के जीते-जागते हिस्से हैं।
अंतिम फैसला
यह संग्रह “हँसी का हथियार” है जो पहले आपको हँसाता है, फिर सोचने पर मजबूर करता है और अंत में कई जगह चुप करा देता है।
आज के हिंदी व्यंग्य में यह सबसे ज्यादा “देसी”, सबसे ज्यादा “बेबाक” और सबसे ज्यादा “दर्द भरा” संग्रहों में से एक है।
# प्रकाशक -कौटिल्य बुक्स, ई-2/59,सेक्टर 11,रोहिणी, नई दिल्ली 110085, संस्करण 2026 ,मूल्य 350₹
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संपादक- किस्सा कोताह
226 w ब्लॉक, फेस 2, शताब्दीपुरम,
ग्वालियर - 474005 (मप्र)
मोबा. 9826695172, 7000646075
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