# मूलचंद्र गौतम
कलियुग में बाबा तुलसीदास और उनके परम भाष्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बिना जीवन और समाज को समग्र रूप में समझा नहीं जा सकता. कलिकाल की बाबा की भविष्यवाणी शब्दश: खरी उतर रही है. आचार्य जी के विरुद्धों के सामंजस्य के सिद्धांत को समझे बिना इसकी माया और लीला बड़े बडों के पल्ले नहीं पड़ती. विज्ञान के तमाम शोध इस मामले का कोई समाधान नहीं देते. इकहरा सनातन का हल्ला बोल इस समस्या का कोई जिक्र तक नहीं करता. सृष्टिकाल के आरंभ से ही देवासुर संग्राम से लेकर आजतक सत्ता प्राप्ति का द्वन्द्व, समीकरण और उस पर कब्जा ही उसकी एकमात्र उपलब्धि है.व्यक्ति और समाज के भीतर जर, जोरू और जमीन को लेकर चल रही एकाधिकार और वर्चस्व की जंग में मानवमात्र के कल्याण का कोई दर्शन उसके पास नहीं है. इस सनातन युद्ध से अध्यात्म में पलायन क्या एकमात्र और सही विकल्प है. जब रावण ही राम का रूप धारण कर ले तो यह माया भ्रमित करती है.
चोटी और लंगोटी वाले पीछे देखू सनातन और आगे देखू आधुनिकता की टाई उर्फ कंठलंगोट के बीच सामंजस्य और संतुलन बैलगाड़ी और सुपरसोनिक जैसा है. इसके गडबडाते ही दुर्घटना की अत्यधिक संभावना है. एक जमाने में सिर पर चोटी धर्म ध्वजा का काम करती थी जिसके कटते ही धर्म विखंडित हो जाता था.यह बेहद संवेदनशील मामला था. बाबा के जमाने में इस तरह की अराजकता और सांप्रदायिक घृणा आम थी. आचार्य जी की निगाह से यह दुर्लभ सत्य छिप नहीं सकता था .काव्य में लोकमंगल की साधना और सिद्धावस्था की खोज करते हुए कर्मक्षेत्र में विरुद्धों के सामंजस्य का सौंदर्य उन्हें लोकधर्म का सौंदर्य लगता था जिसका दर्शन अनेकानेक रूपों में होता है. किसी कोट- पतलून -हैट वाले को धाराप्रवाह संस्कृत बोलते अथवा किसी पंडित वेशधारी को अंग्रेजी की प्रगल्भ वक्तृता का चमत्कार इसी कोटि में आता है. विज्ञान ने इस चमत्कार में लाखों गुना वृद्धि कर दी है.उसने भाषा की अभेद्य दीवारों को ध्वस्त कर दिया है. ट्रांसक्रिप्शन से संचार और संवाद की दुनिया बेहद विस्तृत हो गयी है. दशानन और सहस्रबाहु का यह आधुनिक सुपर कंप्यूटर रूप है जिसे रूढिग्रस्त सनातन सिद्ध नहीं कर पा रहा.आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस के वाबजूद उसने अभी तक यह क्षमता अर्जित नहीं की है.
भारत में हिंदुत्व समर्थक सत्ता प्रतिष्ठान के चलते मंदिर, महंत, तथाकथित धर्माचार्यों और कथावाचकों का वर्चस्व चरमोत्कर्ष पर है. इस स्थूल धर्म के चलते व्यापक सूक्ष्म मानव धर्म और दर्शन विमर्श से गायब हैं. शीर्ष पर थोड़ा सा कामचलाऊ सर्व धर्म समन्वय का लोकतांत्रिक दिखावा जरूर है. कार्यपालिका और न्यायपालिका भी कमोबेश सत्ता समर्थक होने को बाध्य हैं.अभी सत्ता में तथाकथित इस सनातन की यह राजनीतिक भूमिका बढेगी,कम नहीं होगी .सत्ता और तथाकथित धर्म का यह व्यापार और विस्तार को प्राप्त होगा.
परंपरागत यौन नैतिकता सनातन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. लव जिहाद ने उसके ठेकेदारों की नींद उडा दी है. मातृवत् परदारेषु के समर्थकों के सामने भारत माता को डायन बोलने वाले समाज को आदिम जंगलराज में ले जाना चाहते हैं जहां वर्जित कुछ भी नहीं है.केवल नर और मादा रह जायेंगे. लाभ लोभ ही परमधर्म है. धर्म परिवर्तन इसी प्रवृत्ति का प्रभाव है. विश्व की महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग का कारण भी यही संस्कृति है.
बाबा ने इस भावी चुनौती और चेतावनी को भांप लिया था. अंध भोगवादी समाज में कलिकाल बिहाल किए मनुजा, नहिं मानहिं कोउ अनुजा तनुजा का नैतिक पतन रोकना केवल पुलिस और कानून के बस का नहीं है. समाज का अंकुश किसी पर नहीं चलता. खाप की छाप ढीली हो चुकी हो तो इज्जत के लिए हत्या कोई समाधान नहीं है. रूढिग्रस्त सनातन समाज अपनी बेडियों को ढीली करना नहीं चाहता. व्यक्ति स्वातंत्र्य की कोई नयी लचीली सामंजस्यपूर्ण अवधारणा उसके पास नहीं है .ईश्वर और इतिहास के मरने की घोषणाओं के वाबजूद ये मरने को तैयार नहीं. इतिहास का बदला वर्तमान से लिया जायेगा?
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