चाचा ने चाची को चांदनी चौक में चांदी की चम्मच से चटनी चटाई
यह बच्चों की खिलवाड आज की हकीकत बन चुकी है.चम्मच भले सोने की हो गयी हो लेकिन अनुप्रास की तुक नहीं मिलती. चटनी के भी इतने प्रकार विकसित हो चुके हैं कि समर्थ लोग अघा नहीं पा रहे हैं.उनकी जिह्वा की चटोरी तृष्णा तृप्त होने में नहीं आ रही. चटनी की यह सुरसा अब बजरंगबली के काबू में भी नहीं आ रही. भैरव का सोंटा भी खुट्टल हो चुका है. दारिद दशानन की मायावी सेना राम नाम की आड में मालामाल हुई जा रही है.
चौंसठ कलाओं में चोरी भी एक महान कला है. त्रेता और द्वापर में इसे लीला का आध्यात्मिक महत्व प्राप्त था. वनवास में राम जी को भील,वानरों की इतनी ही सेवा काफी थी कि उनके बर्तन भांडे सुरक्षित थे. रावण तो उनकी धर्मपत्नी सीता जी तक का अपहरण करके ले गया था. सीता यानी कृषि भूमि को लेकर तो महाभारत तक हो गया था जिसमें दुर्योधन सुई की नोंक के बराबर जमीन बिना युद्ध के देने को तैयार नहीं था. कन्हैयालाल ने तो माखन चोरी और गोपियों के वस्त्रों की चोरी को लीला में परिवर्तित कर दिया था जिसका तगडा जबाव गोपियों ने उनकी प्यारी मुरली को छिपाकर दिया था.
कलिकाल में पूरी दुनियामें,जर, जोरू और जमीन पर जबरन कब्जे की परंपरा जारी है जो आधुनिक रूप में तेल और यूरेनियम तक पहुंच गयी है. उसी को लेकर तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारी निरंतर चल रही है.
जहां तक चंदे की बात है तो यह सृष्टि के आरम्भ काल से ही जारी है यानी जबसे सूरज चांद अस्तित्व में आये. सूरज की रोशनी चोरों को मौका नहीं देती थी.दिन में ठगी और बटमारी तो संभव थी चोरी नहीं. इसलिए सारे निशाचर रात में ही सक्रिय होते थे.यहां तक कि अभिसार भी रात में होता था. चंदामामा खुद इस कुकर्म में शामिल थे.बच्चों तक ने इसे पहचान लिया था कि आप खायें थाली में मुन्ने को दें प्याली में. प्याली के टूट जाने पर मुन्ने को बजाने को मुफ्त राशन की थाली वोट के बदले रिश्वत में हिस्से की तरह पकडा दी जाती है. जिसे वह ताउम्र नौकरशाही की वफादारी की तरह निभाता है. कुछ मुन्ने इस चालाकी को समझ जाते हैं तो जुआ तुडाकर विपक्ष में शामिल हो जाते हैं.
गरीबों के सब काम चंदे से ही संपन्न होते थे. कई बार तो कफन कांटी तक चंदे से जुटाए जाते थे. कुछ घीसू माधव उस चंदे से दारू पीकर गम गलत कर लेते थे. यह लत बाकायदा अभी तक कायम है जहाँ अबला महिलाओं की मेहनत की कमाई प्रतिदिन शराबखोरी की भेंट चढ जाती है ,पिटाई अलग से होती है. चंदा देने वालों की गति भीख देने वालों जैसी है. उन्हें पता नहीं चलता कि उनके दान की क्या सद्गति-दुर्गति हो रही है. अब चंदा भी धंधा है. वो जमाने लद गये जब चवन्नियां मेंबरों से राजनीतिक पार्टियां चलती थीं, चुनाव लडे जाते थे. कार्पोरेट के मोटे मोटे चंदों ने क्रांतिकारी बदलाव पैदा कर दिया है. अब तो हारने वाला उम्मीदवार भी करोड़पति हो जाता है.
# शक्तिनगर, चंदौसी, संभल उ.प्र.244412