Friday, May 30, 2014

काठ की हांड़ी और चौहान साब की चूक


राजनीति की तरह भाषा भी बेहद कुत्ती चीज है .कमान से निकला तीर और जुबान से निकला बयान लौट कर नहीं आता फिर आप लाख सफाई देते फिरें कि मेरा यह मतलब नहीं था या मीडिया अर्थ का अनर्थ कर रहा है .मुहावरे और लोकोक्तियों की भी दुर्गति हो रही है .अचूक अवसरवादियों ने हर अवसर को भुनाने की कला में महारत हासिल कर ली है लेकिन फिर भी कुछ चौहान अब की बार चूक गये हैं जिसका उन्हें बेहद पछतावा है .पता नहीं कैसे वे अब की बार हवा का रुख पहचान नहीं पाए ?
ऐसे ही कई चौहान इस बार चुनाव के धंधे में दिवालिया हो गये हैं .उनका घर बार सब कुछ लुट चुका है .यहाँ तक कि कोई नामलेवा भी नहीं बचा है .बुरा हो मोदी का कि उनकी आखिरी हसरतें चौराहे पर दम तोड़ चुकी हैं और कफन -काँटी तक का इंतजाम चंदे से कराने की नौबत आ चुकी है .देश की नामुराद –नमकहराम जनता को इत्मीनान से कोसने के लिए वे स्विट्जरलैंड की ठंडी वादियों में चले गये हैं ताकि दिमागी दिवालिया होने से बचे रहें और उनकी काली कमाई बची रहे .
दरअसल उन्हें इस देश के भावुक मूर्खों से पहले से ही नफरत रही है ,इसीलिए उन्हें देश में धुले हुए कपड़े तक पसंद नहीं आते थे . उनके फोड़े –फुंसी तक का इलाज अमरीका में होता है .इन्हीं जाहिल –गंवारों ने उनका भट्टा बैठा दिया है .यहाँ तक कि  उनके देवता श्मशानवासी शिव तक उनके खिलाफ हो गये .ये जटाजूटधारी बदबूदार गंजेड़ी –भंगेड़ी उन्हें पहले ही पसंद नहीं था और अब तो वह खुलकर नंगे भूत -प्रेतों के साथ है .क्षीरसागर में लेटे कमलनाथ तक को पसंद नहीं आई है उनकी यह फूहड़ पसंद .लक्ष्मी जी के ड्राइवर उल्लूनाथ को तो यह  परिणाम पहले से पता था .शेषनाग ने भी अबकी बार सर हिलाकर मना कर दिया था कि चुप रहो –जमानत बचाने तक के लाले पड़ जायेंगे .कृष्ण के वंशज तक बचाने नहीं आयेंगे .अब वे उतने अंधक –बंधक नहीं रहे कि कोई अललटप्पू उन्हें हांक ले जाये.
मैंने पहले ही उन्हें समझाया कि काठ की हांड़ी एक बार भी बहुत मुश्किल से काम कर पाती है और आप हैं कि इसे बार –बार आजमाने पर आमादा हैं .चूहे तक डूबते जहाज से सबसे पहले भागते हैं .लेकिन  आप अपनी अकड में डूबते जहाज में ही बैठे रहे ताकि आपको कोई चूहान न कहे.मैंने कहा कि इस बार   हांड़ी बदल लो लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी .चमचों की भी कोई इज्जत –औकात होती है .दुनिया उन्हें यों ही मोटी –मोटी पगार देकर सलाहकार नहीं बनाती अब झेलो .नूरे चश्म और चश्मे चिरागों तक ने समझाया कि बुढौती की शादी जगहंसाई के अलावा कुछ नहीं होती लेकिन इश्क के डेंगू का डंक जिसे लग जाये वह एनडी हो जाता है .तो अब हो जाओ एनडी-फेंडी ...या जो चाहो हमारी बला स

Tuesday, May 6, 2014

कबन्धों का महाभारत


रामलीला और रासलीला तो देश में बारह महीनों चलती है लेकिन महाभारत सिर्फ चुनाव के मौसम में दिखाई देता है .इसे तटस्थ होकर सिर्फ दो लोग ही देख सकते हैं –एक संजय और दूसरे कृष्ण .कुछ लोगों ने संजय को द्वापर का दूरदर्शी पत्रकार माना था .यह नारदजी से  चाल ,चरित्र और चिन्तन में कुछ अलग था .एक तो इसने दोनों पक्षों में लगाई-बुझाई करके आग को ज्यादा भडकाया नहीं ,दूसरे निजी स्वार्थ को खबरों से अलग रखा .कल्पना कीजिये कि उस जमाने में पेड मीडिया होता तो क्या होता ?हिरोशिमा –नागासाकी का जनसंहार काबिले जिक्र तक न होता .

कुछ अति धार्मिक लोग जो आज भी राम वन गमन और लक्ष्मण को शक्ति लगने पर दहाड़ मारकर-बुक्का फाड़कर रोते हैं ,उनकी हालत तो बेहद खराब हो जाती .रामचरित मानस में जिन्होंने भी राम –रावण के महामायावी युद्ध का सजीव वर्णन पढ़ा है ,उनके  आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं .कलिकाल में यही दृश्य चुनाव लीला में दिखाई देते हैं .हजारों वीरों को अपनी शमशीर से प्रकम्पित करता हुआ वीर ,जरा से शिखंडी के सामने आते ही धराशायी हो जाता है .पहले जमाने में तो पितामह को उत्तरायण आते ही मुक्ति मिल गयी थी लेकिन आज के पितामहों को तो शरशैया ही नहीं छोड़ रही –कम्बल की तरह .पता नहीं उनका प्राण कहाँ अटका है . कलिकाल में इसीलिए जनता को यह सख्त ताकीद कर दी गयी कि घर में महाभारत की प्रति न रखें वर्ना घर में ही बावेला मच जायेगा .व्यासजी को भी इसी कारण श्रीमदभागवत की रचना करनी पड़ी ताकि लोग लीला में लगे रहें ,युद्ध से बचे रहें .रामलीला में भी विभीषण की तरह रावण की नाभि का भेद बताने वाला तक कोई नहीं है .ये विकीलीक्स,कोबरापोस्ट...सब फेल हो चुके हैं .
बाबा तुलसीदास भी कितने पागल थे कि उन्होंने बनारस के गली मुहल्लों के नाम तक रामलीला से जोड़ दिए .अब रामनगर को कोई नहीं पूछता . रामावतार काशीनरेश के कहने से कोई वोट नहीं देता .काशीनाथ तक खिसियाये हुए घूम रहे हैं –खीसें निपोरते हुए .जैसे त्रिनेत्र अपना त्रिशूल इन्हीं को थमा गये थे .
यानी कुल मिलाकर लुब्बोलुबाव यह है कि जान आफत में है .वानरदल खोंखियाया हुआ घूम रहा है ,संकटमोचन को कोई हल नहीं दिख रहा –समस्या का .बुरा हो अयोध्या का अपना बवाल काशी के मत्थे मढ दिया .वोटर माया से भ्रमित है .उसे मार्ग नहीं दिख रहा .बुद्ध की तपस्थली से भी कोई मध्यमार्ग दिखाई नहीं दे रहा .दर्शन, पर्सन सब फेल हैं .नेटवर्क गायब हैं .क्या लीला है ?
ऐसे ही माहौल में कबन्धों का महाभारत चालू है .सम्बन्धों को तिलांजलि देकर ही कबंध बना जा सकता है –जहाँ अपना पराया कोई नहीं .कालातीत कला और साहित्य –संगीत के सब रसिया इसमें कबंध बन चुके हैं  त्रेता –द्वापर का भेद मिट चुका है .कोई संजय और कृष्ण मौजूद नहीं कि सही –सही बताये कि क्या चल रहा है या इस युद्ध का क्या अंजाम होगा .खुदा हाफि

Thursday, May 1, 2014

नेता -नीति और सेक्स नैतिकता


भारत किसी भी मामले में अमेरिका नहीं हो सकता लेकिन हमारे नेता हैं कि उसे हर मामले में अमेरिका बनाने पर तुले हैं और विडम्बना यह है कि पश्चिम भारतीय पारिवारिक पवित्र मूल्यों की तरफ लौट रहा है .अमेरिका में क्लिंटन –मोनिका और इटली के बर्लुस्कोनी का मामला एक मिसाल हो सकता है कि वहाँ की जनता ने इनके कदाचार को मूल्यों के रूप में खुलेआम स्वीकार करने से इंकार कर दिया .
राजतन्त्र में राजाओं द्वारा असंख्य रानियों को पत्नी के तौर पर रखने की स्वतंत्रता थी लेकिन पटरानी की संतान ही उत्तराधिकार रखती थी .इस्लाम में भी चार पत्नियों की स्वीकृति मजबूरी के कारण  थी –शौक नहीं .रामायण और महाभारत इस बहुविवाह के कारण उत्पन्न सम्पत्ति के असमान बंटवारे की विवाद कथाएं ही तो हैं .उनमें हम अध्यात्म तलाश कर लें –यह अलग बात है .
हिन्दू समाज की संरचना में तलाक अभी उस तरह सहज रूप से स्वीकृत नहीं हुआ है जैसे इसाई और मुस्लिम समाज में स्वीकृत है . पुरुष और स्त्रियों के विवाह और विवाहेतर सम्बन्धों की दबी –ढकी चर्चा अफवाहों के रूप में ही सही होती है .समाज इनका हिसाब जिन्दगी भर आपसे मांगता रहता है .बड़े आदमियों का हिसाब बड़े पैमाने पर माँगा जाता है तो छोटों का छोटे पैमाने पर .गांधीजी और नेहरु के साथ –साथ अनेक नेताओं के हिसाब दस्तावेजों की तरह दर्ज हैं .जयप्रकाश नारायण और प्रभावती जिसमें उन्हें हार कर झख मारकर रोहित को अपना जैविक पुत्र स्वीकार करना पड़ा.सोनिया को विदेशी बहू होने का कष्ट आज तक झेलना पड़ रहा है वरना तो उन्हें  बहुमत के बावजूद देश का प्रधानमन्त्री स्वीकार करने में क्या हिचक है ?मोदी का वैवाहिक जीवन क्यों चर्चा में है ?आप लाख कहते रहें यह उनका निजी मामला है इसमें कोई दखल नहीं दे सकता लेकिन एक नेता का  मर्यादा के अलावा कुछ भी निजी नहीं हो सकता .आप हर बात के लिए जबावदेह हैं .जनता सब देखती है कि आप क्या खाते हैं –कहाँ जाते हैं .
इस मायने में लोकतंत्र जनता का ही नहीं नेताओं की भी आत्म मर्यादा और आत्म नियंत्रण का नाम है .वरना क्यों घोटालों की चर्चा होती है ?आप देश को लूटकर मजे से विदेश भाग 
सकते हैं .
दिग्गी के ताजे मामले ने इस निजी नैतिकता को फिर चौराहे पर खड़ा कर दिया है .जनता जनार्दन का फैसला सर माथे ...

Tuesday, February 25, 2014

चुनावी घोषणा पत्र

 

आखिरी आम आदमी का चुनावी घोषणा पत्र

# मूलचन्द्र गौतम

गांधीजी के ग्राम स्वराज का आखिरी आदमी तथाकथित आजादी के नाम पर ठगे जाने के बाद हताश था .गांधीजी की इच्छा के विरुद्ध  नेहरु जी के शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने भारतमाता के ग्रामवासी पुत्रों को घोर दारिद्र्य  में धकेल दिया था .उस समय भाखड़ा नंगल बांध को नये तीर्थ का दर्जा मिल गया था .अब तो ऐसे अनेक तीर्थ बन गये हैं ,जिन्होंने उत्तराखंड के पुराने तीर्थों और तीर्थयात्रियों की दुर्गति कर दी है .हजारों जिंदगियों से खिलवाड़ के बाद सत्ता में बैठे लोगों की बेशर्मी चरम सीमा पर है .वोट की लालसा प्रबल है .
गांधीजी को नहीं मालूम था कि उनके घोषित उत्तराधिकारियों और हत्यारों में मिलीभगत है .एक ने उनकी शारीरिक हत्या की दूसरे ने नैतिक .अब यही  मौसेरे भाई मिल बांटकर देश को खा जाने की तैयारी में हैं .लोकतंत्र में चुनाव के प्रहसन ने इनके हौसले बुलंद कर दिए हैं .मनरेगा का मजदूर तो इनके खिलाफ चुनाव लड़ने से रहा .उसके पास तो  धरतीपकड की तरह जमानत जब्त कराने तक की औकात नहीं है .लोकसभा के चुनाव खर्च की सीमा चालीस लाख है तो गरीबी की रेखा से नीचे का आदमी तो लड़ने से रहा .सरकारी खर्च से चुनाव के लिए सब्सिडी मिलने वाली नहीं ?
गांधीजी के इस आखिरी आदमी को अन्ना में अपना सुखद भविष्य दिखाई दिया था जो  शीघ्र ही घोर निराशा में बदल गया .आम आदमी पार्टी ने भी उसे त्रिशंकु बनाकर अधर में झूलता हुआ छोड़ दिया .अब इस पार्टी में भी पचास लाख से कम खर्च की हैसियत का आदमी कबूल नहीं –मकबूल नहीं .तभी से इस नामाकूल आदमी का भेजा सदी के महानायक के कूल –कूल को खोज रहा है ताकि कुछ तो भेजा ठंडा हो .इस तथाकथित आम  आदमी ने बड़ी उम्मीद से उम्मीदवारी की दावेदारी पेश की थी कि शायद अब उसकी बंद किस्मत का ताला खुलने वाला है ,लेकिन हाय रे किस्मत ,यहाँ भी वह सबसे नीचे से फर्स्ट रहा .उपरवाले टिकट ले उड़े .

इसी मायूसी  में उसने तय किया है कि अब वह भी गांधीजी के देश के तमाम आखिरी आदमियों की फ़ौज खड़ी करेगा और मिशन दो सौ बहत्तर में लग जायेगा .उसका अलग घोषणा पत्र होगा जिसमे गम्भीर और गमगीन टाइप लोगों को प्राथमिकता मिलेगी .आत्महत्या करने वाले किसानों –मजदूरों ,गरीबों  के परिवारों सैनिकों ,बलात्कार पीडिताओं को आरक्षण का लाभ मिलेगा .एक लाख खर्च की अधिकतम सीमा होगी –यह राशि भी जनसहयोग से जुटाई जाएगी .पदयात्रा से चुनाव प्रचार होगा .सायकिल से ऊपर की सवारी विलासिता मानी जाएगी..चाय –काफी ,बीडी –सिगरेट –शराब वर्जित होगी  .सांसद अपने वेतन को भी जनसेवा में लगाएगा .सांसद निधि के खर्च का हर साल हिसाब देगा .इच्छुक लोग आवेदन कर सकते हैं .
# शक्तिनगर ,चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741

Friday, January 3, 2014

आम और केले की लड़ाई

आम और केले की लड़ाई

रामलाल कई दिन से पीछे पडा है यह जानने को कि यह बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपुल क्या बला है ?बार –बार मना करने के बावजूद अड़ा है कि मालूम करके ही रहेगा .बिहार में मास्टरों की पात्रता परीक्षा की बुरी खबर से मेरी हालत खराब है .बताइए यह भी कोई बात हुई कि केलकुलेटर और कम्प्यूटर के दौर में मास्टर गिनती ,पहाड़े ,पौआ,अद्धा ,पौना खुद रटें और बच्चों को रटाये.एक से एक नयी शब्दाबली आ रही है .सबको जानने का ठेका मास्टरों ने ही ले रखा है क्या ?भूगोल के मास्टरों को अपने देश के बारे में नहीं मालूम विदेश की कौन बात करे .गूगल ब्यॉय ओर गर्ल से पूछो या सीधे गूगल दादा का ही sir चाटो .
लेकिन साब रामलाल तो बस रामलाल हैं .मैंने टरकाया कि देखो आम फलों का राजा है न तो बस समझो कि लोकतंत्र में आम आदमी भी राजा है ,जिसे चाहे sir सिर पर बैठा ले और जिसे चाहे धूल चटा दे .अब बनाना –यानी केला उसकी जगह थोड़े ही ले सकता है वैसे भी बड़े –बूढ़े घर में केले का पेड़ लगाने को मना करते हैं क्योंकि केला –अकेला रह जाता है या अकेले रहना पसंद करता है ,फल भले गुच्छे में लगता हो .फिर आम जितने प्यार और ललक से खाया जाता है ,उतना केला नहीं .केला लक्ष्मी की तरह चंचल होता है ..
जान हार धन कैसे जाये,जैसे हाथी केला खाये.अब ढूंढती रहे सीबीआई हाथी के गोबर को .रामलाल यह सुनकर बिफर उठे –मास्साब गोबर क्यों कहते हैं ?दरअसल रामलाल हरनारायण पाण्डे की सोहबत में बिगड़ रहा है .हर समय ग्राम्यत्व दोष में डूबा रहता है .गंदगी कुरेदने का कोई भी मौका मिल जाये बस ,दोनों उसकी तह क्या तलहटी में पंहुच जायेंगे तुरंत .दिखावें भेली देंगे चिरकुना.अब ढूंढते रहिये कि चिरकुना क्या है ?हर समय अज्ञान की परीक्षा कौन दे ?मैं तो मुंह ही नहीं लगाता ऐसों को .करते रहें ससुरे अपना राग दरबारी .
मुझे संतोष है कि कई दिन से रामलाल ने मुझसे फिर यह सवाल नहीं पूछा है ,क्योंकि मुझे खुद नहीं
मालूम कि लड़ाई में कौन जीतेगा –बनाना या मैंगो ?
#मूलचन्द गौतम,शक्तिनगर ,चन्दौसी,संभल ,उ .प्र.244412 मोबाइल-9412322067


Tuesday, October 15, 2013

जूतों की कारसेवा

जूतों की कारसेवा

*मूलचन्द गौतम
पाहुन की पनही भी आदरणीय होती है .उनके आने पर न केवल पैर धोये जाते हैं बल्कि उनके जूतों की भी पूरी सार –संभाल की जाती है .दूल्हे के जूतों को चुराने का एकाधिकार सिर्फ सालियों का होता था वो भी मजाक के बतौर नेग के लिए ताकि पाहुन की बर्दाश्त की पहचान हो जाय .कुछ पाहुन तो घर से चलते ही अपने जूतों को लेकर सतर्क हो जाते थे .उनके पैर भले घायल हो जाएँ ,जूतों को खरोंच भी न आये .कुछ तो लाठी पर लटकाकर चलते थे और गाँव के सिमाने पर ही उन्हें धारण करते थे . तेल पिये चमरौधे जूते से सकेल निकले ,मुख ज्यों उधार खाये के ऐसे ही  पाहुन के चरणों को पूजने से मना करने के कारण ही निराला जी को पुत्री वियोग सहना पडा था .क्या अब इन स्थितियों में कोई  बुनियादी फर्क आ गया है .दहेज का दानव न जाने कितनी बेटियों को रोज जिन्दा निगल जाता है और हम  निरीह कुछ नहीं कर पाते .
जूतों की कहीं इज्जत देखनी हो तो तिरुपति जाइये या किसी गुरुद्वारे में .बड़ी साज-संभाल से रखे जाते हैं मुफ्त .यही उन उपेक्षितों की कारसेवा है .कोई तनखैया घोषित कर दिया जाता है तो ये पददलित और भी आदरणीय हो उठते हैं .किसी –किसी के भाग्य में मुख्यमंत्री –मंत्री भी आ जाता है .बाकि जगहों में इनकी और इन्हें धारण करने वालों की बड़ी बेइज्जती होती है ,सुरक्षा के लिए पैसे अलग देने पड़ते हैं .इसीलिए दक्षिण भारत में कोई जूते पहनकर ही नहीं जाता –मन्दिर और तीर्थों में .सबरीमाला के कल्लू नंगे पैरों पूरा जहाँ नाप लेते हैं .उत्तर भारत में तो मन्दिरों से जूते- चप्पल ऐसे उठाये जाते हैं जैसे आजकल दुपहिया और चौपहिया .देखते रह जाओगे ?पहचान तक न पाओगे अगर थोड़ी देर में आपके ऐन सामने से निकले तो भी .क्या हुनर है और क्या हुनरमंद ?
कोई जमाना था जब जूतों की कोई कीमत नहीं थी .आज तो जूता ही उतने में आता है जितने में पहले भैस आ जाती थी .लोग बड़ी शान से बताते हैं जूतों की कीमत और ब्रांड .पहले गरीब टायरसोल की चप्पलें पहनकर जिन्दगी काट देता था ,अब उसकी जगह प्लास्टिक ने ले ली है .अच्छे जूते की तमन्ना सिर्फ भगवान की कृपा से पूरी हो सकती है .यही होरी का गोदान है आज के जमाने में .
लोगों को सड़कों पर कारों को हसरत भरी निगाहों से देखना कोई कम यातनाप्रद नहीं होता .भला हो फिल्मवालों का जो उनकी कुछ तो इच्छा पूरी हो ही जाती है .पुलिस  को मोबाइलों ,मोटरसाइकिलों की चोरी को तो अपराधमुक्त कर देना चाहिए .आखिर नागरिक का कोई तो अधिकार होता है देश की सम्पत्ति पर .अब सरकार बांटेगी बीपीएल से नीचे वालों को .पहले ही बंट जाते तो अपराध का ग्राफ मंहगाई की तुलना में तो कम बढ़ता .चलो देर आयद दुरुस्त ...जिन्हें नहीं मिलेगा वे छीनेंगे नहीं तो क्या करेंगे ?उनकी तो जैसे कोई सोसाइटी ही नहीं ?अब एक अदद जूते के लिए आदमी कारसेवा करेगा क्या ?फिर कहेंगे नक्सलवाद देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है ?
*शक्तिनगर ,चंदौसी ,संभल उ.प्र.२४४४१२  मोबाइल-९४१२३२२०६७

moolchandmoolchandmoolchandgautam .blogspot .com 

Thursday, October 3, 2013

विमर्श :शौचालय क्रांति

# मूलचन्द्र गौतम
देश में अब तक हरित ,श्वेत ,रक्त ,संचार इत्यादि अनेक प्रकार की क्रांतियाँ हो चुकी हैं .अब जरूरत है शौचालय क्रांति की .गांधीजी ने बहुत पहले छुआछूत विरोधी आन्दोलन के सिलसिले में इस क्रांति की जरूरत को महसूस कर लिया था ।किसी एक जाति के लोगों का ही जिम्मा क्यों हो दूसरों की फैलाई हुई गन्दगी को साफ करना।यह व्यक्तिगत के साथ सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।फ्लश सिस्टम ने इसे आसान बनाया लेकिन गटर और सड़कों की सफाई ?सदियों से दलितों की मानसिकता की जड़ में जमी हीनता ,कुंठा इतनी आसानी से तो नहीं निकल जायेगी?
.ईश्वर-अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान -से गांधीजी का आशय यही था कि सभी धर्मों का सार है -शुचिता-पवित्रता ।यम नियम के पालन और आचरण ने ही गांधीजी को महान बनाया । हरिजन और वैष्णव जन का सामंजस्य ही उनका परम लक्ष्य था ।आगा खां पैलेस में जेल काटते हुए कस्तूरबा से उनका झगड़ा खुद शौचालय की सफाई को लेकर हुआ था जिसमें गांधीजी की जिद की जीत हुई थी  ।देवता  यों भी गंदगी में वास नहीं  करते .आज भी देवता फाइव स्टार से कम सफाई में नहीं रुकते .इसीलिए अब आधुनिक स्थापत्य में मॉड्यूलर किचेन की तरह मॉड्यूलर बाथरूम पर जोर है।एक हमारे भाई साहब को तो हिन्दुस्तानी तरीके के उकडूं बैठने वाले शौचालयों तक से नफरत है .उनका अटल सिद्धांत है कि किसी आदमी का स्तर जांचना हो तो उसका बाथरूम देख लो ।जैसे शाकाहारी लोग प्याज तक की गंध बर्दाश्त नहीं कर पाते वैसी ही हालत कमोड के शौकीनों की होती है .वे कहीं भी घुसने से पहले यह पूछना नहीं भूलते कि वाशरूम में इंग्लिश सीट  है कि नहीं ?

सरकार ने देहातों तक में सिर पर मैला धोने की प्रथा को बंद करने के लिए शौचालयों के निर्माण को प्राथमिकता दी है .शुष्क शौचालय लगभग खत्म हैं।देहाती महिलाएं पहले शौच के बहाने खेतों में बैठकर घंटों पंचायत करती थीं .किसी आदमी के आते ही उसे गार्ड ऑफ ऑनर देती थीं जिसका उल्लेख राग दरबारी तक में बड़ी शान से हुआ है।घरों में शौचालयों के निर्माण से इस कुप्रवृत्ति पर रोक लगी है .बलात्कार की घटनाएँ भी कम हुई हैं .शौच से बायोगेस प्लांट लगाकर लोगों ने क्रांति कर दी है .ऑर्गेनिक फ़ूड का नया धंधा उठान पर है ।
मानव विकास सूचकांक के मानकों के अनुरूप मल मूत्र विसर्जन के वैश्विक तंत्र और प्रबंधन की दृष्टि से भारत निम्नतम स्तर पर है ।सबै भूमि गोपाल की तरह सर्वर्त्र विसर्जन की आजादी ने यह कमाल कर दिया है।गधे के पूत यहाँ मत मूत की इबारतों से गधों को कोई फर्क नहीं पड़ता ।भुगतान पर इन सुविधाओं को हासिल करना आम जनमानस में अभी नहीं पनपा है ।यूरोप यात्रा में मेरा यह अनुभव और पक्का हुआ ।मुफ्त का चन्दन हमें हर जगह चाहिए।सब्सिडी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।शौचालय निर्माण की सब्सिडी में भृष्टाचार और घपले ने यह सिध्द कर दिया है कि यह हमारे खून में है।भारत में केवल सिक्किम अकेला राज्य है जहाँ सार्वजनिक मल मूत्र विसर्जन और प्लास्टिक का उपयोग सख्ती से वर्जित है। काश ऐसा पूरे देश में लागू होता ।
हर  क्रांति का सबसे बड़ा फायदा मध्यवर्गीय सवर्णों ने उठाया है .अब जूतों की ज्यादातर दुकानें इन्हीं की हैं .जातिगत पेशे समाप्तप्राय हैं।अब सफाई कर्मचारी बनने में किसी की हेटी नहीं भले एवजी में आदमी रख दें शिक्षकों की तरह ।बड़े बड़े क्वालीफाइड युवक चपरासी की सरकारी नौकरी की लाइन में हैं। पंडित विन्देश्वर पाठक ने सुलभ शौचालयों से क्रांति कर दी है .देश भर में एक नयी संस्कृति विकसित की है ।इतना ही  नहीं उसे इंटरनेशनल बनाकर संयुक्तराष्ट्र संघ से मान्यता भी हासिल की है। लोगों को रोजगार दिया है ।अच्छा हो कि इस कार्य का  पूरे देश का ठेका उन्हें दे दिया जाय ।
 शौचालय क्रांति के विरोधी जानते हैं कि इससे  उन्हीं लोगों को लाभ होगा जो सदियों उनके जूतों तले कुचले जाते रहे हैं .अब इन मूढों को कौन समझाए कि जमाना बदल रहा है .धंधा देखो -जाति और धर्म में क्या रखा है ?
# शक्तिनगर, चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741