Wednesday, November 12, 2014

नये बीरबल की खोज

# मूलचन्द्र गौतम
अकबर के साथ किसी एक आदमी का नाम जुडा है तो वह बीरबल है .उन्हीं के किस्से- कहानी लोक में मशहूर हैं .बीरबल न होता तो अकबर का कोई नामलेवा न होता .लोग तो अकबर से ज्यादा  अक्लमंद बीरबल को मानते हैं .पता नहीं ये बीरबल उस जमाने चाय पीता था क्या ?जो हर समय उसे नई –नई तरकीबें सूझती रहती थीं .

भारत एक खोज की तर्ज पर आजकल बीरबल की खोज जारी है .जैसे चुनाव में जीत की गारंटी के लिए बाहुबली की तलाश हर दल के नेताओं को रहती है ,उसी तरह हर नेता अपने साथ एक बीरबल भी रखता है ,जिसका काम नेताजी की छवि को हर तरह से चमकाना होता है .एक तरह से यह बीरबल राजा और प्रजा के बीच सौहार्द और सम्बन्ध कायम करने का विश्वसनीय माध्यम होता है .राजतन्त्र में यह काम अक्सर अक्लमंद ,हंसोड़ विदूषकों के जिम्मे होता था .कई बार जब राजा उनके इशारों को समझ नहीं पाता था तो उन्हें आँखों में अंगुली डालकर समझाना पड़ता था .नबावी दौर में भी यह काम जारी रहा .
अंग्रेजों ने अपने इन वफादार बीरबलों को बड़ी –बड़ी जायदाद और इनाम –इकराम बख्शे थे .रायबहादुर –रायसाहब जैसे ख़िताब इन्हीं  जैसों के लिए थे .आजादी की लड़ाई में यह काम कवियों और शायरों ने किया था .इसीलिए गांधीजी इन्हें बड़ी इज्जत देते थे . गुरुदेव और राष्ट्रकवि जैसी उपाधि तक उन्हें हासिल थी .
चाचा नेहरू जरा नजाकत –नफासत पसंद थे .बीरबलों की उन्हें जरूरत नहीं थी लेकिन राष्ट्रवादी एक- दो कवि उन्होंने भी पाल रखे थे .चीन युद्ध में इनका वीररस किसी काम नहीं आया था और देश की गरीब ,साधनहीन सेना पिट गयी थी .तब बीरबल की जगह मेनन को बलि का बकरा बनना पडा था .
उसके बाद अनेक बीरबल हुए हैं जिनका नाम जनता जानती है ,इसलिए बताने की जरूरत नहीं .उनमें कई तो वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं .आजकल की भाषा में चुनाव में जमानत जब्त हो जाना ही वीरगति को प्राप्त होना है .इसीलिए हर झंगा –पतंगा शहीद कहलवाना पसंद करता है .कई तो  खुद ही अंगुली में आलपिन चुभाकर शहीद हो जाते हैं .
तो किस्सा –कोताह यह कि देश को नये बीरबल की जरूरत है . जो लोग खुद को इस पद के योग्य समझते हों आवेदन करें .वेतन ,बंगला ...वगैरह योग्यतानुसार।
# शक्तिनगर, चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741

-------------------------------------------------------------------------------------------------------

Sunday, November 2, 2014

पीला धन



पीला धन 
# मूलचन्द्र गौतम

जब से देश में काले धन की चर्चा शुरू हुई है ,पीला धन शर्म के मारे जमीन में धंसा जा रहा है . काले धन के मालिकों से सवाल है कि आम ,सरसों पर फूल आने बंद हो जाएँ तो क्या उन्हें काले धन से पैदा किया जा सकता है ? इतिहास गवाह है कि रावण से ज्यादा काला धन तो आज तक किसी के पास नहीं हुआ ,न होगा फिर भी आज तक कोई दूसरी सोने की लंका नहीं बन पाई ?हनुमान ने इस  पीली सोने की लंका में आग लगाकर इसे काली करने की कोशिश की थी लेकिन यह आज तक काले धन की सुरक्षित जगह है .यह बात अलग है कि अब इसकी राजधानी श्रीलंका से हटकर स्विटजरलैंड हो गयी है ताकि कोई हनुमान उसमें  फिर से आग न लगा सके .
भारत में गोधन ,गजधन, बाजिधन ,रतनधन की टक्कर पर गरीब का संतोष धन भारी पड़ता था ।वर्तमान में विश्व में  भारतीय जनता से ज्यादा सोनाप्रेमी कोई जनता नहीं है . सोना खरीदने में असमर्थ होने पर गरीब आदमी चांदी और गिलट से भले संतुष्ट हो जाता था लेकिन सोना उसकी पहली पसंद थी .राजा –महाराजा हीरा ,मोती,माणिक रखते थे लेकिन भगवान का ऐश्वर्य सोने में ही रहता था .लक्ष्मी गणेश तो सोने में ही बसते थे ।स्वर्ण मन्दिर की कल्पना तिरुपति और शिरडी तक फ़ैल रही है .अब शंकराचार्य तक का धंधा पिट चुका है .उन्हें कहीं से भी पीला धन प्राप्त नहीं हो रहा .जबकि अल्लू पल्लू कथावाचकों की बल्ले बल्ले है ।मालामाल हैं।अम्बानी ,अडानी से टक्कर ले रहे हैं।
धंधे में कल के लौंडे झंडे गाड़ रहे हैं .बीवियों को करोड़ों -अरबों के मकान –जहाज गिफ्ट दे रहे हैं .शादी ब्याहों में धन की बौछारें हो रही हैं ।देसी गर्ल की नकल को विदेशी गर्ल ने पीट दिया है।वेडिंग डेस्टिनेशन में इटली पहली पसंद है।वैडिंग डिजायनर सब तय कर रहे हैं ।यह किसी मामूली आदमी के बस का काम नहीं।
लगता है देश में काले और पीले धन के बीच महाभारत छिड़ चुका है और सुप्रीमकोर्ट संजय की तरह तटस्थ होकर धृतराष्ट्र को युद्ध का ताजा हाल सुना रहा है . पीले धन को रखने का भारी झंझट है ।बैंक के लॉकरों पर कभी छापा पड़ सकता है।प्रतीक्षा है कि आखिर में वासुदेव निर्णय दे देंगे कि काले और पीले धन में कोई फर्क नहीं है .खोजना ही है तो सफेद धन की खोज की जाय ताकि देश को फिर से सतयुग में लाया जा सके .लक्ष्मी के वाहन उलूक राय की भी यही राय है कि देश में कालेधन की वापसी के सारे प्रयत्न छोडकर सफेद धन की खोज की जाय .
बस तभी से नेताओं के कपड़ों की सफेदी बढती जा रही है-पल –प्रतिपल।
बॉलीवुड और क्रिकेट ने सारे पुराने धंधों को पीट दिया है।हथियारों की दलाली में तो मुहावरे की तर्ज पर चांदी ही चांदी है।ड्रग्स का नया धंधा उफान पर है ।झंगे पतंगे के पास चार्टर्ड प्लेन हैं जिनसे जब जहां चाहे उड़कर जा सकते हैं।फिलहाल मॉरीशस पहली पसंद है।एक एक के पास अनेक नागरिकताएँ हैं ।गरीब आदमी एक भी निभाले तो बहुत है ।
#शक्तिनगर,चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741

Saturday, November 1, 2014

चश्मा ,नंगी आँखों का सच और इतिहास



इतिहास सत्ता का प्रोपेगेंडा मात्र है –जर्मन नाटककार अर्नेस्ट टालर.
आखिर प्रोफेशनल इतिहासकारों के बाद साहित्यकारों को ही इतिहास और राजनीति के प्रेत क्यों परेशान करते हैं ?
 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद को क्या जरूरत थी –इतिहास के घने जंगल में घुसने और भटकने की .आचार्य चतुरसेन और वृंदावनलाल वर्मा से लेकर भगवान सिंहतक भटक रहे हैं लेकिन अंतिम रूप से कुछ तय नहीं हो पा रहा कि इतिहास का सत्य और तथ्य क्या है ?फिर कैसे तय होगा इतिहास ?रोमिला थापर और पी एन ओक के बीच का झगड़ा है सारा .शास्त्र और शस्त्रों से भी तय नहीं हो पाया यह झगड़ा .विभाजन ,मुतबातिर दंगों  और बावरी मस्जिद विध्वंस से भी सुलझ नहीं  पाई यह गांठ .
बोतल में बंद यह जिन्न फिर सामने आकर खड़ा है –जबाव पाने को .संघी इतिहासकारों ने पुराने  अस्त्र –शस्त्र संभाल लिए हैं .सास भी कभी बहू थी की नायिका सुलझाएगी इस अबूझ पहेली को ?डर है कि अबकी बार कहीं ताजमहल को ढहाकर शिवमन्दिर निर्माण का संकल्प न ले लिया जाय ?अकबर और राणा प्रताप .औरंगजेब और शिवाजी फिल्मों और टीवी सीरियलों से बाहर न निकल पड़ें कहीं ?

Saturday, October 25, 2014

काला धन और छद्म राष्ट्रवाद


भ्रष्ट और छद्म धर्मनिरपेक्ष यूपीए सरकार के खिलाफ कालेधन को स्वदेश लाने,अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के विरुद्ध हिंदुत्व को जाग्रत करने के एजेंडे पर केंद्र की सत्ता में आई मोदी सरकार द्वारा सुप्रीमकोर्ट में विदेशों में कालाधन रखने वालों के नामों का खुलासा न करने के कमजोर  तर्कों ने सिद्ध कर दिया है कि बुनियादी तौर पर जनमत के साथ धोखा हुआ है .वित्तमंत्री अरुण जेटली के ब्लेकमैली कुतर्कों ने कांग्रेस को भले कठघरे में खड़ा किया हो ,जनता को निराश ही किया है .मोदी के विदेशी दौरों और हवाई वादों से सरकार की हवा बनाने की रणनीति ज्यादा समय तक कारगर नहीं होगी .रामजेठ्मलानी और सुब्रहमन्यणम स्वामी जैसे शुभचिंतकों की मानें तो  सरकार की ओर से सुप्रीमकोर्ट में उठाये गये  ये ‘बिना सोचे समझे ‘कदम केवल समस्या से बचने के बचकाने बहाने हैं .दोहरे कराधान से बचाव के समझौतों की आड़ में कौन से राष्ट्रवाद की रक्षा होगी यह छिपी हुई बात नहीं है .कांग्रेस ने इसी तरह के गोपनीयता के नियमों के तहत आजादी के समझौतों का खुलासा आज तक नहीं होने दिया है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जनता किस पर विश्वास करे .जैसे सांपनाथ वैसे नागनाथ के जाल में फंसने के अलावा भी  उसके पास कोई मजबूत विकल्प बचता है क्या ?राष्ट्रीय और क्षेत्रीय झमेलों में सत्ता का ध्रुवीकरण उसे कैसे भटकाता है ,यह बतानेवाले मीडिया का भी व्यवसायीकरण इस विकल्पहीनता को बढ़ाता है . आज जनविरोधी प्रयत्नों को निष्फल करने की रणनीति पर विचार की बेहद जरूरत है .कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वालों के विरुद्ध भाजपा मुक्त भारत के ध्रुवीकरण के विकल्प मौजूद हैं . जल्द ही जरूरत उस तीसरे विकल्प की भी महसूस होने लगेगी जो दोनों से मुक्त करके देश को सही दिशा देगा .

Monday, October 20, 2014

नेताओं का भ्रष्टाचार और उत्तर -दक्षिण की जनता का फर्क



हाल ही में अन्नाद्रमुक प्रमुख और तमिलनाडू की मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता के आय से अधिक सम्पत्ति और  भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने से दुखी उनके  १९३ समर्थकों ने जान की बाजी लगा दी .इनमें से १३९ की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई और बाकी ने ख़ुदकुशी कर ली .जयललिता ने  पार्टी की ओर से मृतकों के परिवारों से सहानुभूति जताते हुए सभी को बिना भेदभाव के तीन –तीन लाख रूपये की राहत राशि देने का ऐलान किया है जबकि ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले लोगों के उपचार के लिए पचास हजार की राशि दी जाएगी .आत्मघातियों को मुआवजे का यह ऐलान क्या इस नकारात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं देगा ?सुप्रीमकोर्ट को चाहिए कि वह इस घटना का स्वत;संज्ञान लेकर इस पर रोक लगाये भले उसे इस रूप में जमानत देने की एक नई शर्त जोडनी  पड़े .
 ये घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि दक्षिण की जनता अपने नेताओं और अभिनेताओं को आत्मघाती भावुकता की हद तक प्यार करती है .इससे पहले भी ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जब दक्षिण की जनता ने ऐसा ही आत्मघाती व्यवहार किया है. इंदिरा गाँधी  की हत्या के बाद का आक्रोश जहाँ सिखों के विरुद्ध हिसा और लूटपाट में उभरा था वहीं राजीव गाँधी की हत्या से भी इस अंध भावुकता का गहरा सम्बन्ध प्रमाणित हो चुका है .अमिताभ बच्चन की बीमारी से उपजी व्यापक सहानुभूति में भी यही भावना दिखी दी थी लेकिन वह आत्मघाती नहीं थी .उत्तर भारत की जनता वैसे भी नेताओं को लेकर इतनी भावुक नहीं जितनी दक्षिण की है . सुखराम ,लालूप्रसाद यादव या अन्य नेताओं की गिरफ्तारियों में कोई आत्मघाती कदम जनता में नहीं दिखा .क्या यह जनता की मानसिकता का फर्क है या परिपक्वता के स्तर का ?

Sunday, October 12, 2014

चाय के प्याले में हुदहुद

# मूलचन्द्र गौतम


  

जबसे तूफानों का नामकरण होना शुरू हुआ है तभी से चाय के प्यालों ने बगावत खड़ी कर दी है कि अब उनमें आने वाले तूफानों को भी सर्वनाम के बजाय नामों से पुकारा जाना चाहिए .आखिर उनकी भी कोई इज्जत है .इसीलिए उनके नाम ऐसे रोमांटिक रखे गये हैं कि लोग उनसे डरने के बजाय प्यार करने लगें।प्याज ,टमाटर और डीजल- पेट्रोल और तमाम तरह की गैस की कीमतों में उछाल आने पर विपक्षी नेता सरकार की लानतें मलामतें करके आसमान सिर पर उठा लेते हैं लेकिन चाय ,तम्बाकू और दारू कितने भी महँगे हो जायें किसी को कोई फर्क नहीं पडता।अजीबोगरीब है यह देश। इसलिये जब तक पेट्रोल का भाव दारू के बराबर न हो जाय तब तक तमाम विरोधी आन्दोलनों पर पाबंदी लगनी चाहिए  ।आजकल देश में चाय बेचने वालों को बार गर्लों से ज्यादा जो इज्जत  मिल रही है उससे उनका दिल गार्डन गार्डन हो गया है  .आखिर चाय के प्याले में ही तूफान आता है –कुल्हड़ में नहीं .
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल .जो कभी नहीं नाची .काफी को भी देश में वह इज्जत नहीं मिल पाई जो चाय को मिली।काफी हाऊसों में गिने-चुने लोग ही बहसों में उलझते हैं जबकि चाय बहुसंख्यक पेय है।उसके बिना मजदूरों की भी  गुड मॉर्निंग  नहीं होती वैसे भी जब से मुर्गे चिकन हुए हैं उन्होंने बांग देना छोड दिया है .आखिर लोकतंत्र बहुसंख्या का खेला है –मेला है –रेलमपेला है और नहीं तो बिगड़ा हुआ ठेला है ,जिसे चाहे जिधर ठेलते रहो .बुद्धिमान लाख कहते रहें कि बहुसंख्यक मूर्ख होते हैं लेकिन उन्हें चुनाव में जिताने को अक्लमंद मिलते ही नहीं इसलिए ज्यादातर की जमानत जब्त हो जाती है और फिर हिम्मत इतनी टूट –फूट जाती है मरम्मत की गुंजाइश भी नहीं रहती .इसीलिए वे काफी हाउसों में बैठकर  बहुसंख्यक चाय प्रेमियों को कोसते रहते हैं .
काफी बुद्धिजीवियों का परम प्रिय पेय है .काफी हाउसों की एक जमाने में जितनी धूम मची रहती थी उतनी चाय की नहीं .चाय पीने वाले चतुर्थ श्रेणी के माने जाते थे इसीलिए उन्हें साहित्य और विचार की दुनिया में वह इज्जत जिन्दगी भर नहीं मिलती थी जो काफी पीने वालों को तुरंत मिल जाती थी –इंस्टेंट .लोहिया जी बुद्धिजीवियों से मिलने को दिल्ली ,लखनऊ,इलाहाबाद के काफी हाउसों की खाक छानते रहते थे ,बहस भी बेजोड़ करते थे लेकिन नेहरूजी के मुकाबले हमेशा हल्के पड़ जाते थे .यही हाल उनके चेलों का था और है .चाय को समाजवादी पेय मानने वाले कम नहीं हैं लेकिन उनका शेयर पूरी दुनिया में डाउन है। अब सब धान बाईस पसेरी नहीं चलने वाला।

पीने वालों को क्या कहिये फेंकू की चाय के अलावा कोई चाय उन्हें  नहीं जंचती .बजाते रहें जाकिर हुसैन तबला –वाह ताज कहते हुए .बनारस के पप्पू की चाय के प्रेमी किसी भी चाय को पसंद नहीं करते .ग्रीन टी,लेमन टी....और जाने कितनी –कितनी टी हैं .ट्रम्प  को कोई नहीं मिली तो गरम पानी ही सही .इसमें भी उनकी बेइज्जती ही हुई .कम से कम संजीवनी ही मंगा लेते।

.खैर चाय वालों ने एक राष्ट्रीय स्तर की बैठक में सर्वसम्मति से यह तय कर लिया है कि आइन्दा से चाय के प्यालों में उठने वाले तूफानों को भी वही नाम दिया जायेगा जो नये तूफान का होगा .यही उनका ब्रांड होगा और बाकी कोई ब्रांड नहीं चलेगा .जो भी इस निर्णय का विरोध करेगा उसे जाति से बाहर कर दिया जायेगा .देश निकाला भी हो सकता है .ऊपर से राष्ट्र्द्रोह का मुकदमा चलेगा अलग से ।
# शक्तिनगर ,चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741

Tuesday, September 30, 2014

लफ्फाजी के पुए




जबसे रामलाल ने सुना है कलिकाल में केवल गाल बजाने वाले ही पंडित कहलायेंगे तभी से उनकी पौ बारह हो रही है .अब हर जगह वे मौका देखते ही यह काम शुरू कर देते हैं . राम लाल के पिताजी उन्हें कथावाचन के धंधे में डालना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके बाद कहीं जजमानी के बारह गाँव उनके चंगुल से निकल न जाएँ .वे उन गांवों के खेरापत,पुरोहित वगैरह सब कुछ थे .
रामलाल गपोड़ी नम्बर वन थे .चलते –चलते किस्से गढने में उन्हें महारत हासिल थी .कोई चतुर सुजान उनकी तथ्यात्मक गलती पकड़ भी लेता था तो वे अपनी हाजिरजबावी से उसे लाजबाव कर देते थे .अगर वो फिर भी न माना तो खीसें निपोर कर फी... ही... ही.. की ऐसी हंसी हँसते थे कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाती थी .
पिताजी ने उन्हें समझा दिया था कि केवल रामायण और गीता –दो ही किताबें उन्हें जिन्दगी में सब कुछ उपलब्ध करवा देंगी –धनधान्यसुतान्वित .यही नहीं कोई यजमान कायदे का मिल गया तो पौ बारह .तब से वे इसी पौ बारह के पीछे पगलाए घुमते हैं .उनका एक पैर लखनऊ तो दूसरा दिल्ली .तीसरा पैर होता तो उसे वे मुंबई में रोपते अंगद की तरह .
तो यही थी रामलाल की रामलीला .उनकी पत्नी का नाम भी लीला ही था जिसे वे प्यार से सत्यनारायन कथा की लीलावती कहते थे .अनुप्रास उनका प्रिय अलंकार था .थ्री डी,फॉर पी ,कभी थ्री आर , कभी थ्री एस ...थ्री उनका प्रिय नम्बर .सट्टेबाजी के शौकीनों के लिए फिक्स .कहीं यजमान की पौ बारह पड़ गयी तो वे हनुमान जी के रोट के नाम पर सवा मनी ,ढाई मनी ..और पांच मनी तक करा देते थे .
रामलाल को खाने में पुए पहली पसंद थे ,खीर के साथ  मिल जाएँ तो मानो उन्हें  अमरपद मिल गया .इसलिए वे हर समय सपनों में भी पुए ही देखते थे- खाते थे .मालपुए  जैसे उनके गालों में भरे रहते थे ,इसलिए उनकी आवाज भी खास तरह की हो गयी थी .
रामलाल परसों दिवंगत हो गये .उनकी आखिरी इच्छा विदेश जाने की थी जो अधूरी रह गयी है .उनके पुत्र –पौत्रों ने कसम खायी है कि वे विदेश तक अपनी जजमानी फैलाकर उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देंगे .उनकी तेरहवीं में खीर और मालपुए बनेंगे .उनकी पहली पसंद .