Friday, February 20, 2015

नकल माफिया :अकल माफिया

# मूलचन्द्र गौतम

बचपन से ही दुकानों पर लिखी दो चार इबारतें चाहकर भी भूली नहीं जा सकतीं .उधार प्रेम की कैंची है .आज नकद कल उधार.नक्कालों से सावधान .नक्कालों की तर्ज पर ही चलता था बक्कालों .
दरअसल देश सृष्टि के प्रारम्भ से ही असल और नकल के चक्कर में उलझा हुआ है .वर्ण और वर्णसंकर की यह लड़ाई आज भी जारी है भले नाम बदल गया हो .वर्णसंकर अब जीएम हो गया हो .फिल्मों में भी असल से ज्यादा डुप्लीकेट पापुलर हो गये हैं क्योंकि वे सस्ते और सुलभ हैं . सीडी और मोबाइल का बाजार तो इन्हीं लोकल मार्काओं ने हथिया लिया है .चीनी माल इसीलिए इण्डिया पर भारी है .चार सौ बीसी अब अपराध की दफा नहीं चतुराई का पर्याय हो गयी है .नटवर नागर नंदा कन्हैयाजी नटवरलाल से पिट गये हैं .
परीक्षा के दिनों में नकल की चर्चा कुछ ज्यादा ही होती है .पुराने जमाने के थर्ड क्लास फर्स्ट पोजीशन यह मानने को ही तैयार नहीं कि अब फर्स्ट क्लास टोकरियों में बंटने लगी है .कैट में सौ परसेंटाइल कोई अजूबा नहीं रह गया है .जेब में माल हो तो आईएएस से लेकर मेडिकल में एंट्रेंस तक सब कुछ उपलब्ध है .यही मैनजमेंट का कमाल है .जितना लगाओ उतना पाओ.अब जरूरत तनखा की नहीं पेकेज और ऊपरी आमदनी की है ,जिसे शर्म से नहीं शान से बताया जाता है हिन्दू होने  की तरह .पहले नकलची होना शर्म की बात होती होगी अब शान से घर के विदेशी सामान की खूबियाँ बखान की जाती हैं .स्वदेशी तो जैसे गांधीजी के साथ ही दफन हो गया .
अनर्थ शास्त्र ने एक नई शब्दावली को जन्म दिया है .चाणक्य का कोई नाम भी नहीं लेता .जैसा नेता वैसा ही उसका इकनोमिक्स—मनमोहनोमिक्स ,मोदिनोमिक्स ....समाजवाद ,धर्म निरपेक्षता का कोई बाजार नहीं .कोई –कोई एंटीक्स का विदेशी दीवाना मांगता है तो उसे गीता ,खादी,चरखा भेंट कर दिया जाता है .व्यापार समझौते उससे अलग .माल हमारा शर्तें उनकी .श्रम हमारा मुनाफा उनका .एमएनसी जिंदाबाद .
नकल के कारण ही आज यूपी –बिहार क्या पूरे हिंदी प्रदेशों की शिक्षा का भट्टा बैठ गया है .अब यहाँ के सरकारी बोर्डों की कोई साख नहीं बची .केन्द्रीय बोर्डों और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने थोड़ी सी लाज बचा रखी है बस.यहाँ की विश्वविद्यालयीय शिक्षा का भी यही बुरा हाल है .अपार नकलची छात्रों की भीड़ को बेकारी के लिए नियोजित करने के लिए स्ववित्तपोषित योजना के अंतर्गत खुले कालिजों में ठेके पर नकल करवाकर डिग्रियां बांटी जा रही हैं . गाइड और गैसपेपरों ने संस्थागतऔर व्यक्तिगत शिक्षा का अंतर समाप्त कर दिया है .इसी कारण ठुमके पर यूपी –बिहार ही सबसे पहले मैनेज होते हैं .
नकली माल की बढती खपत देखकर ही अपुन ने नकल माफिया की खिलाफत करने के लिए अल्पसंख्यक होने के बावजूद अकल माफिया बनाने का दृढ निश्चय कर लिया है .आखिर अकल की भी कोई कीमत होती ही है बाजार में फ़ास्ट फ़ूड के बीच ऑर्गेनिक फ़ूड की तरह .देश में नहीं तो विदेश में सही .इसीलिए अब मातृभाषा की जगह अंग्रेजी ने ले ली है . स्तरीय भीख मांगने के लिए भी अंग्रेजी चाहिए .महरी और नैनी में यही फर्क है .सरकारी शिक्षा और इलाज हासिल करने वालों में अब केवल गरीबी रेखा से नीचे के ही लोग रह गये हैं .वो भी इसलिए ढोए-पाले जा रहे हैं ताकि उनका वोट अबाध तरीके से मिलता रहे .
# शक्तिनगर ,चन्दौसी ,संभल 244412
मोबाइल 8218636741

Saturday, February 14, 2015

भेड़ों का मुण्डन

# मूलचन्द्र गौतम
पता नहीं क्यों लोग कोलम्बस और वास्कोडिगामा की तरह देश के गडरियों को उनका समुचित महत्व नहीं देना चाहते ,जबकि नये से नये चरागाहों की खोज में भटकते हुए उन्होंने एक से एक नामी आविष्कार किये हैं .हमारे चाचा खुद देश के नामी चरवाहे थे .उनके पास भेड़ों का देश का सबसे बड़ा झुण्ड था ,जिनके मुंडन में ही पूरे पांच साल लग जाते थे –पहली भेड से लेकर आखिरी भेड़ तक .इतने दिनों में भेड़ें भूल जाती थीं कि पिछली बार उनका मुंडन कब हुआ था .
चाचा ने ही मुझे विरासत की तरह ही यह रहस्य बताया था कि भेड़ और आदमी दरअसल एक ही कौम है ,जिसे गर्मियों में मूडना चाहिए वरना मामला गडबड हो सकता है .कुछ चालाक भेड़ें बगावत कर सकती हैं .उन्हें साधने के लिए चार –छह वफादार कुत्तों की जरूरत पडती है .दुम्बे उनके भौंकते ही दुम दबा कर भाग जाते हैं .
चाचा ने भेड़ों की ऊन के धंधे में लाखों कमाए थे और बाद में तो वे बहुत बड़े एक्सपोर्टर होकर मरे थे .अंगोरा से लेकर पश्मीना तक की उनकी गहरी पहचान थी .इसके बाद उन्होंने लोकल भेड़ों को अपने खास ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया था कमाने खाने के लिए .बस पांच साल में एक बार मामूली सी फीस लेकर उनके पंजीकरण का नवीनीकरण कर दिया जाता था
चाचा ने भेड़ों की श्रेणियां बनाकर धंधे को  टेक्नोलोजी से जोडकर आधुनिक और उत्तर आधुनिक बना दिया था .जो माल पटरी पर पांच रूपये में बिकता था वह मॉल में पांच हजार का था .यह पांच का फंडा उन्हें इतना फला कि उन्होंने देश विदेशों में पांच सितारा होटलों की रेंज ही अरेंज कर ली थी .वे मिटटी को हाथ लगा देते तो वह भी सोने के भाव बिकती थी .
एक बार –एक गधे की आत्मकथा –के लेखक ने उनकी मुलाकात नेहरूजी से करवाई थी जिसमें उन्हें भेड़ों का धंधा छोडकर गधों का पार्लर चलाने की सलाह दी गयी थी ,लेकिन उन्हें गधों की दुलत्तियों से डर लगता था इसलिए वे जिन्दगी भर भेड़ों के ही विशेषज्ञ बने रहे .उन्होंने मुंडन के लिए जावेद हबीब और शहनाज हुसैन  जैसों को ठेके पर रख लिया था  .फिजियोथेरेपिस्ट और डायटीशियनों की देखरेख में उनका धंधा चमचमा रहा था  .कोई सिरफिरा उन्हें चुनौती देने मैदान में उतर आता  तो वे पहले उसे स्माल पार्टनर बनाने का प्यारा सा आफर देते  और अगर नहीं मानता तो उसकी सफाई और सफाया दोनों करा देते थे .
आज भी तमाम भेड़ें उनके बताये गड्ढे में ही थोक में गिरती हैं मजाल है कोई एक भी  इधर उधर हो जाये .इसलिए आज भी भेड़ों का मुंडन जरी है ,वे चाहे राजघाट पर मुड़ें या रामघाट पर क्या फर्क पड़ता है ?
#शक्तिनगर, चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741

Wednesday, February 4, 2015

राजनीति का खूंटा

# मूलचन्द्र गौतम
अराजक ,हरजाई और खूंटे से बंधे जानवर और आदमी में बड़ा फर्क होता है .द्वार –द्वार घूमने वाले की कोई इज्जत समाज में नहीं होती .इसीलिए  लोग संघ , दल ,गिरोह और अखाड़े में रहने को प्राथमिकता देते हैं .खासकर कलियुग में .क्योंकि बाकी युगों में अकेले दम पर भी काफी कम किया जा सकता था लेकिन कलिकाल में यह नितांत असम्भव है .वैसे भी मनुष्य एक सामाजिक जानवर/प्राणी है .
यही सोचकर अपुन ने खुद ही मर्जी से एक  खूंटा चुन लिया है ताकि द्वार न भटकना पड़े और सुनना न पड़े –अच्छा खासा मुस्टंडा है मेहनत क्यों नहीं करता भीख मांगता फिरता है .बाबा तुलसीदास भी इस तरह के अपमानों से आजिज आकर आखीर में राम नाम के खूंटे से बंध गये थे .सूरदास भी परेशान होकर गा उठे थे –मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै...जैसे उड जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पे आवे .इसीलिए जहाज को डूबता देखकर चूहे सबसे पहले भागते हैं फिर चुहियाँ .फिर मजबूत जहाज पर आकर टिक जाते हैं . आजकल तकनीकी भाषा में इन्हीं को अवसरवादी कहते हैं .बकने वाले बकते रहें नसीब हमारे साथ है .
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जिसका खूंटा मजबूत होता है उसी का जुगाड़ और पौवा फिट होता है .राम जी को यह राजनीति नहीं आती थी इसीलिए उनकी अयोध्या और मन्दिर अब जाकर फाइनल हुआ है ,जबकि काशी मथुरा –नम्बर पर है –भजे जा राधे –राधे .आखिर सोलह कलाओं की ताकत के आगे कौन टिक सकता है . आज चुनाव हो जाये तो कन्हैयाजी बीस साबित होंगे .उनके जितने दांव पेंच थे उतने आज तक किसी के पास नहीं .जिस धोबी पछाड़ को रामचन्द्रजी नहीं काट पाए थे ,उसी दांव से कृष्ण जी ने कंस और कालिया की ऐसी तैसी करके रख दी थी .वह तो आखीर में उनका कस बल चुक गया था वरना बहेलिया भी मारा जाता .
हमारे गाँव में भी एक मुंशी जी थे जिनका खूंटा बहुत मजबूत था .जाने कितने भोले भाले किसानों की जमीनें उन्होंने कौड़ियों के भाव अपने और कुनबे के लोगों के नाम करा लीं थीं .एक सिरफिरे पढ़े लिखे ने उनके खिलाफ पुलिस –कचहरी में जाने की हिम्मत की थी तो मुंशीजी ने मरते वक्त सुपुत्रों से अपने बदन में एक खूंटा ठुकवा लिया था और उसे उखाड़ने के अपराध में सिरफिरे के कुनबे को जेल में ठुंसवा दिया था ,जिनको आजतक जमानत नहीं मिल पाई है .
आवारा और दमदार जानवर और आदमी कभी कभार जोर आजमाइश में खूंटा उखाडकर भागने की फ़िराक में रहते हैं तो मालिक उनके गले में रस्सी और सांकल के साथ चारपाई का एक पाया जिसे घतमल्ला कहते हैं ,बांध दिया जाता है .आजकल उस कृत्या का नया नाम सीबीआई है जो भागने वालों के गले में बांधी  जाती  है .
# शक्तिनगर, चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741




Monday, January 5, 2015

क्रान्तिकारी लफ्फाजी

# मूलचन्द्र गौतम

सिर्फ काला और सफेद –दो ही रंग नहीं होते प्रकृति में

आज सहसा विश्वास नहीं होता कि हिंदी चिन्तन और चिंताओं में प्रेमचंद के इस कथन कि- साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है- की तरह मुक्तिबोध के इस कथन कि- पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है –का बेहद दुरूपयोग नहीं हुआ है ?
 मौके बेमौके मार्क्स और एंगेल्स के उद्धरणों की झड़ी लगा देने वाले लोग प्राय : जरूरत पड़ने पर भी लेनिन का नाम तक लेना गवारा नहीं करते .क्यों नहीं करते ?यह जानने की जरूरत भारत में  आज दक्षिणपंथी राजनीति के बहुमती उभार के दौर में  जितनी वामपंथी दलों और उनके नेताओं को है ,उससे कम वामरंगी साहित्यकारों –कलाकारों को नहीं है .
1918 में लेनिन ने पार्टी की एक बैठक में जो महत्वपूर्ण बहस उठाई थी ,उसे आज फिर से भारत में उठाने की जरूरत है कि क्रन्तिकारी युद्ध के विषय में क्रन्तिकारी लफ्फाजी हमारी क्रांति को तबाह कर सकती है ....क्रन्तिकारी लफ्फाजी से हमारा मतलब है घटनाओं के एक खास मोड़ पर तत्कालीन अवस्था में वस्तुस्थिति का ख्याल किये बिना क्रन्तिकारी नारों को दुहराना .ये नारे बहुत शानदार ,आकर्षक और उन्मत्त्कारी ,परन्तु निराधार होते हैं –क्रन्तिकारी लफ्फाजी का यही लक्षण है .लेनिन ने इस लफ्फाजी को एक गंदी खुजली वाली तकलीफदेह बीमारी यों ही नहीं कहा था .
कहने की जरूरत नहीं कि यह बीमारी रायपुर महोत्सव के बहाने इन दिनों हिंदी के लेखकों में फैली हुई है .गनीमत बस इतनी है कि इससे कुछ लोगों में अनबोला भले हो गया हो इबोला नहीं हुआ है .
ऐसे में फिर बकौल लेनिन –बुद्धिमान वह नहीं है जो कभी गलती नहीं करता .ऐसे आदमी न कहीं हैं ,न हो सकते हैं .बुद्धिमान वह है जो ज्यादा बड़ी गलतियाँ नहीं करता और जो उन गलतियों को आसानी से और जल्दी से ठीक करना जानता है .
हिंदी के कुछ स्वयम्भू तथाकथित वामपंथी लेखकनुमा -नेताओं  में वस्तुस्थिति को समझे बिना राजनीति के मसलों को साहित्य में हल कर लेने की इतनी उतावली है कि वे खुद को मशाल समझने लगे हैं और दुश्मनों के लिए मसालों का काम करने में ही कृतार्थ हो रहे हैं .इस कबंध युद्ध में वे अपनों को ही टीन की तलवार चमकाकर न केवल डरा रहे हैं ,बल्कि मैदान छोड़कर भाग जाने को मजबूर कर रहे हैं .ये महारथी दरअसल अपने संगठनों को सक्रिय करने के बजाय काल्पनिक शत्रुओं के साथ डान क्विग्जोट की तरह व्यवहार करके नकली विजय के उन्माद में डूबे हैं .गोर्की ने –व्यक्तित्व का विघटन –निबन्ध में  इन जैसे अवसरवादी मध्यवर्गीय व्यक्तिवादियों की कुत्सित –घृणित मनोवृत्तियों का खाका बहुत पहले ही खींच दिया था .बुद्धिजीवियों की बस्तियों में हर एक सदस्य के हृदय में अपने अहं,अपने मैं –पन को मनवाने की रुग्ण और विक्षिप्त भावना की भयंकर ज्वाला दहक उठती थी .लोग इस तरह व्यवहार करते थे जैसे जिन्दा ही उनकी खाल खींच ली गयी हो .रायपुर प्रसंग में यही दिख रहा है .वहां माओवादियों के द्वारा किये जा रहे जनसंहारों के समर्थन में या सलवा जुडूम के विरोध की रणनीति गड्डमड्ड हो रही है .कौन किसका नैतिक इस्तेमाल कर ले रहा है –यही कशमकश चल रही है .तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले.ईर्ष्यालुओं को लिफाफों में रखा धन दिख रहा है .सस्ते में बिक जाने की तोहमत या खुद के न बिक पाने का मलाल .मुद्दे गायब हैं .जनसंस्कृति के पक्षधर होने की दुहाई देने वालों के पास इस गंदगी में घुसने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा .क्या यहाँ मुक्तिबोध का तीसरा क्षण उन्हें नहीं दीखता जो उनके अनुयायी होने का दावा करते हैं .हबीब तनवीर का छत्तीसगढ़ क्या सलवा जुडूम का आकांक्षी है .दो कदम आगे और चार कदम पीछे की रणनीति क्या सरकारी आतंकवाद का समर्थन है ,या  गलत नसबंदी में अकाल मौत की शिकार आदिवासी महिलाओं का काव्यात्मक विरोध .सत्ता और संस्कृति के कर्णधार वहां भी सूत्रधार हैं और नैतिक विलाप करने वालों में भी शामिल हैं क्योंकि उनका बहुत पुराना तर्क है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता .कहीं तो कोई रेखा दिखे कि सब कहीं धुंधलका है .
वामपंथी दलों की पूंछ से जुड़ने का दावा करने वाले लेखक संगठनों में ही यह बिखराव और मनमुटाव क्यों दिख रहा है ?क्या पार्टनर की पालिटिक्स की दिशा पूछने-जानने  वालों के पास कोई अधिकार है या यह सब खाहमखाह का तुफैल है और लोग जबरदस्ती आपस में जूझ रहे हैं .साहित्य और संस्कृति क्या कोई यांत्रिक कार्यवाही है और उन्हें सम्पन्न करने वाले क्या किसी ऐसे संगठन के सदस्य हैं जहाँ अनुशासनहीनता के कारण उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है .यदि ऐसा है तो इसे सांगठनिक तरीके से ही निबटाया जाना चाहिए न कि चौराहे पर जूतमपैजार के द्वारा .फूस में चिंगारी लगाकर हाथ तापने से यह आग काबू में नहीं आने वाली .इसलिए इस तरह के मसलों को व्यर्थ वितंडावाद ही माना जाना चाहिए और यह अन्त्याक्षरी बंद होनी चाहिए .कहीं आने –जाने से ही साहित्य के मुद्दों का निर्धारण होगा तो सारे लेखक घरों में ही नजरबंद हो जायेंगे.  
# शक्तिनगर ,चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741


Wednesday, December 24, 2014

मदन मोहन मालवीयजी का हिंदुत्व संघी हिंदुत्व से अलग है


भारत रत्न के नाम पर मोदी सरकार ने जो वैचारिक-रणनीतिक घपला मालवीयजी के साथ किया है ,वह सरदार पटेल के साथ किये गये छल की अगली कड़ी है .यहाँ यह साफ करना जरूरी है कि इस घपले के पर्दाफाश से कांग्रेस की दलीय राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है .
मोदी ने देश –विदेशों में  तथाकथित राष्ट्रपिता  गांधीजी के प्रति जो अकाल सम्मान प्रकट करना शुरू किया है ,उसके बीज अटलजी ने ही डाल दिए थे .गाँधीवादी समाजवाद के साथ दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की जुगलबंदी की वह कोशिश इसी घालमेल की पृष्ठभूमि थी .गांधीजी की वैचारिक विरासत पर केवल योग्य कांग्रेसियों का एकाधिकार नहीं है लेकिन जिस  दल और विचारधारा से जुड़े जो लोग खुल्लमखुल्ला गांधीजी की  शारीरिक  और वैचारिक हत्या के पक्षधर रहे हों उन दोमुंहे लोगों से पूछा तो जा ही सकता है की यह यूं टर्न क्यों ?क्या सत्ता बिना गाँधी का नाम लिए नहीं मिल सकती या भारत की जनता केवल और केवल गाँधी के नाम पर ही ठगी जा सकती है .गाँधी भी खुद को हिन्दू कहते थे लेकिन उनका हिंदुत्व एकांगी ,संकीर्ण ,घृणा ,हिंसा पर आधारित न होकर अहिंसक ,सर्वसमावेशी और सहिष्णु था .यही वजह थी की भारतीय जनता को गोलवलकर का हिंदुत्व कभी रास नहीं आया .ईश्वर अल्ला और यीशु का मिलाजुला हिंदुत्व ही उन्हें देश का सर्वमान्य राष्ट्रपिता बना पाया .यही कारण था की वे मृत्युपर्यंत भारत का विभाजन मन से स्वीकार नहीं कर पाए भले इसी के चलते उनकी हत्या हो गयी .
गांधीजी ने इसी हर तरह की कट्टरताओं से बचने और उनका विरोध करने के लिए सोच समझकर हर वर्ग के ऐसे लोगों को साथ लिया था जो इस जटिल लड़ाई में मजबूती से उनके साथ आखिर तक डटे रहें न कि भाग जाएँ या अंग्रेजों से मिल जाएँ .कहने की जरूरत नहीं कि मुस्लिम लीग की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई में मालवीयजी उनके उदारवादी दृष्टिकोण के हिंदुत्व के अडिग प्रतिनिधि थे .उन्हें किसी भारतरत्न की अपेक्षा किसी से नहीं थी . नेहरु की कांग्रेस से भी नहीं .
मालवीय जी को मोदी  सरकार द्वारा वाजपेयीजी के साथ भारतरत्न से सम्मानित करने के पीछे कोई उदारता नहीं ,हिंदुत्व की यही रणनीति है जो बिना किसी छिटपुट विरोध के कारगर  होती दिख रही है तो हौसला बढ़ता जा रहा है रणनीतिकारों का .लुंजपुंज कांग्रेस में आह और करह लेने तक का दम न बचा हो तो यह जिम्मा बौद्धिकों को उठाना चाहिए ,जो उनकी तरफ से रामचन्द्र गुहा ने कुछ –कुछ उठाया है लेकिन इस मुद्दे पर जनता के बीच व्यापक बहस गायब है .

मालवीय जी अपने  दृढ़ता से हिन्दू होने की अटल घोषणा के बावजूद देश में रहनेवाले मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति असम्मान और घृणा रखने के खिलाफ थे ,जबकि गोलवलकर से लेकर भागवत तक निरंतर जहर उगल रहे हैं .इस पृठभूमि में मालवीयजी को दिया जाने वाला भारत रत्न उनका सम्मान नहीं अपने दलीय स्वार्थों की पूर्ती में उनका बेशर्म इस्तेमाल भर है .यानी आप कहते कुछ रहें –करते कुछ रहें और दीखते कुछ रहें अपनी तमाम सरकारी प्रभुता ,दिव्यता और सत्ता के साथ .

Saturday, December 20, 2014

तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

# मूलचन्द्र गौतम


सृष्टि के प्रारम्भ से ही  देव –दानवों की तरह संख्याओं को भी शुभ –अशुभ कोटि में डाला गया है .शुभ कार्यों में पांच-ग्यारह ,इक्यावन ,एक सौ एक से लेकर एक खरब –नील –पद्म एक तक दिए जाने का प्रावधान है तो घूस देने में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है क्योंकि वहां तो मामला अनंत और असंख्य का है .इसलिए जब घोटाले में छिहत्तर करोड़ रूपये  तक की चर्चा होती है तो उसके आगे चेनलों को भी एक लगाने की याद नहीं आती .हिंदुत्व इसे बदलेगा और हर संख्या के आगे एक लगाना अनिवार्य बनाएगा  रोमन में ओनली की तरह .जैसे ओनली लगाने से आगे एक पैसा भी नहीं मिल सकता उसी तरह एक लगाने से भ्रष्ट कमाई पर रोक लगाई जा सकती है .हिन्दुओं के अलावा देश में सब भ्रष्ट हैं .अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बवाल से भी छुटकारा मिलेगा .समान नागरिक संहिता तभी स्थापित होगी .दंगों में में भी मरनेवालों की गिनती सम्प्रदाय के आधार पर नहीं होगी .
भारतीय जनमानस भावनाओं में बह जाने के लिए बदनाम है .हम हर काम अतिवाद पर जाकर करना पसंद करते हैं –भले हमारे  समझदार पुरखे लाख बार समझाते रहें कि –अति का भला न बोलना ,अति की भली न चूप...अति सर्वत्र वर्जयेत के बावजूद हमें बीच में त्रिशंकु की तरह लटकना पसंद नहीं .सूपड़ा साफ नॉट हाफ .इसीलिए हमें तीसरा मोर्चा कभी पसंद नहीं आया .जब देखो तब तीन तिफरका.हम तो सम्विधान संशोधन तक करने को तैयार हैं कि तीन के अंक को संख्याओं से ही बाहर कर दिया जाय .न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी .
हाल ही में तीसरे मोर्चे के कर्णधारों ने समधी -समधी का खेल शुरू किया है ताकि दूसरी ताकत का खेल बिगड़ जाये .समधनें तक कमर कसकर मैदान में हैं –सत्ता संतुलन के लिए .दूसरी ताकत के दामाद का ही खड़ा बखेड़ा नहीं सिमट रहा तो बहू लाने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही .इसलिए देश में आमूलचूल परिवर्तन का ठेका कोई लेने को तैयार नहीं .विपक्ष का कोई एक नेता नहीं .ऐसे में सत्ताधारियों की बल्ले –बल्ले होनी ही है .क्योंकि पिच बल्लेबाजों के हिसाब से बनी है .यह बात अलग है कि सत्ताधारियों में से ही कुछ बल्लेबाज बालर बन जाएँ और कैप्टन को ही क्लीन बोल्ड कर दें .
जब से सिद्धू ने कामेडी का मोर्चा सम्भाला है तब से तो देश में पार्टी की लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ है .इससे कपिल शर्मा भी कहीं से चुनाव लड़ने की जुगत में है .ट्रेजड़ी को पसंद ही कौन करता है .हर समय मनहूस –रोनी सूरत बनाये रहने वालों को मसखरी जनता वैसे भी पसंद नहीं करती .जब मसखरे देश के नेता बन जायेंगे तो अच्छे दिन बिन बुलाये मेहमान की तरह अपने आप आ जायेंगे ,बल्कि घर –घर जाकर दस्तक देंगे कि लो हम आ गये –अब हमें हंस - हंसकर झेलो .तो दोस्तों आने वाले दिन कोमेडी के होंगे .अच्छा है आप भी अपना किरदार तलाश लें .परिणाम के अनुसार आपका मंत्रालय पक्का .जो चाहोगे वही मिलेगा .जनता ही हमारी कामधेनु और कल्पवृक्ष है .उसे जितना बेवकूफ बनाओगे उतना बड़ा फल पाओगे .
# शक्तिनगर, चन्दौसी, संभल 244412
मोबाइल 8218636741


Thursday, November 13, 2014

सुधीश पचौरी

मोदी की बदलती छवि पर मुग्ध आलोचक सुधीश पचौरी
बलि जाऊं लला इन बोलन की
 बाबा नागार्जुन ने सुधीश पचौरी  के भविष्य को पालने में ही पढ़ लिया था . इस उत्तरआधुनिकता के पुरोधा ,मीडिया विशेषज्ञ को विमर्श से मनमाने निष्कर्ष निकालने में महारत हासिल है .दिल्ली विश्वविद्यालय के चार साला स्नातकीय कोर्स के अंधसमर्थक इस अरुण जेटली ने भाजपा के सत्ता में आते ही केतली खौलती देखकर जो पलटी मारी तो वह आज तक ठंडी नहीं हुई है .
उत्तर आधुनिकता की गहरी जड़ें अवसरवाद में धंसी हुई हैं .कहीं भी पाठ,विश्लेषण और विमर्श के नाम पर पलटी मारने की सुविधा –अनेकान्तवाद-स्यादवाद –बहुलता के नाम पर .

आज 13 नवम्बर के अमर उजाला में सुधीश पचौरी की  –मोदी की बदलती छवि और पस्त होते आलोचक –टिप्पणी पढकर इस धारणा की पुष्टि हुई .अशोक चक्रधारी का यह विलोम पूरी धज के साथ चक्रवर्ती मोदी के ध्वजारोहण का अग्रगामी अश्व बना दौड़ता हुआ दिखाई दिया .अपने चौकों –छक्कों से इसने पूरा मैदान छेक दिया .भारतरत्न को भी इस कला में इस महारथी ने पीछे छोड़ दिया .’मोदी के निंदकों को काठ –सा मार गया है .उनकी बोलती मोदी ने बंद नहीं की ,जनता ने की है ‘-जय हो ब्रह्मर्षि की  इस चरण वन्दना की . अब अश्वमेध का पौरोहित्य तो पक्का समझो .तुम्हारा यह पतन होना ही था –धुरंधर .